यह नाम लोक में सबसे प्रसिद्ध है। व्यवहारिक दृष्टि से देखा जाए तो शिव का पुकारने का नाम शंकर हीं है। वैसे तो शिव, महादेव, भोले, नीलकंठ आदि नाम भी अनेक स्थलों पर आदरणीय है, पर शंकर कहते समय भक्त का भाव कुछ और हीं होता है। जैसे माता के वाचक बहुत से शब्दों के होते हुए भी ‘माँ’ शब्द जैसा भाव और शब्दों से प्रकट नहीं हो सकता है वैसा हीं भाव भक्तों के लिए शंकर शब्द का है। शंकर शब्द हृदय के तंत्री को स्पंदित करने वाला एक अनहद नाद है। जिसे उच्चरित होते हीं शरीर रोमाञच पूर्ण हो प्रफुल्लित हो उठता है।
शंकर का शास्त्रीय अर्थ है कल्याण करने वाला। शब्दकोश के अनुसार ‘शं’ का अर्थ है कल्याण और ‘कर’ का अर्थ है करने वाला अर्थात कल्याण करने वाला। शिवरहस्य इस नाम के रहस्य का उद्घटन करता है–
स्मर्तव्य: शंकरो नित्यं शरोतीति शंकर`:।
शंनामाSनल्पमानन्दमनिर्वाच्यमनामयम्।।
भगवान् शंकर का नित्य स्मरण करना चाहिए क्योंकि शंकर कल्याणकारी देव हैं। ‘शं’ का अर्थ है अनिर्वचनीय, असीमित, अनावधिक आनंद। उस आनंद के वह प्रदाता हैं। शंकर का अर्थ आलबाल इस तरह प्रकट करती है–
कर एव सुखं धत्से भझानां कुरुषे च तत्।
पीठे चन्द्र्पुराभिख्ये नाम्ना ख्यातोSसि शंकर:।।
हे शंकर! आप सुख को हाथ में ही रखते हैं और भक्तो के लिए सुख देते हैं अत: आप शंकर कहलाते हैं। आपका चन्द्रपुर नामक तीर्थ में प्रसिद्ध शकंरेश्वर लिग है।
भगवान् कितने दयालु हैं यह शंकर नाम से प्रकट होता है। किसी को देने में थोड़ी भी देर न हो इसलिए सुख को अपने कर में ही रखते हैं। श्रुति भी कहती है कि जिस किसी भी प्राणी को कहीं भी सुखानुभूति हो रही है वह शंकर से हीं हो रही है। हाथ में रखकर भी बाँटते हीं रहते हैं, अपने लिए कभी भी उसका उपभोग नहीं करते क्योंकि सांसारिक सुख की इच्छा शंकर को होती हीं नहीं जैसा पुष्पदंताचार्य ने महिम्नस्तोत्रा में इंगित किया है– नहि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति। शंकर इस नाम का उच्चारण स्वयं वेदभगवान् ने शतरूद्रीय के नमकाध्याय के अंतर्गत किया है–नम: शंकरराय च मयस्कराय च नम:। अत: वेद भी इस नाम की सार्थकता में परम प्रमाण है। यह शंकर हीं समय पर संहारक कहलाते हैं। महाभारत का संग्राम सम्पूर्ण होने के पाश्चात् अजुर्न ने एक बार बाबा व्यास से प्रश्न किया हे भगवन्! मैंने युद्ध के अंदर एक विचित्रा घटना देखी। एक त्रिशूल धारी पुरुष सारे प्राणियों का संहार कर रहा है और उन मारे हुए मनुष्यों को हीं मेरा बाण मारता था। वह पुरुष कौन था? तब व्यास देव ने बताया कि वह कोई और नहीं शंकर हीं थे। वही सारे प्राणियों का शासन करते हैं। तुमने उसी शंकर का दर्शन किया है। भगवान कृष्ण की कृपा से हीं तुम्हें अदृश्य रहने पर भी शंकर का दर्शन हो सका। वे हीं सारे लीलाएँ सम्पन्न करते हैं–ईशानमीश्वरं देवं दृष्टवानसि शंकरम्। (महाभारत, द्रोणपर्व 202/10) सृष्टि संतुलित करने के लिए संहार भी आवश्यक है। शंकर तो योगी और भोगी दोनों का कल्याण करते हैं। भोगी को भोग प्रदान कर और योगी को कैवल्य निर्वाण दान कर इसलिए तो कवि कहीं–कहीं कहता है कि आप स्वयं पहचान में नहीं आते कि योगी हैं या भोगी। पत्नी वाले हैं अत: भोगी है और समाधि् सम्पन्न हैं अत: योगी हैं। ये दोनों बाते आपमें कैसे संभव हैं। क्योंकि भोगी योगी नहीं हो सकता और योगी भोगासक्त होकर समाधिस्थ नहीं हो सकता। अत: आप अनिर्वचनीय हैं। शंकरावतार आचार्य शंकर स्वयं शंकर के चरणों में यह प्रार्थना अर्पित करते हैं–
छन्द: शाखिशिखान्वितैर्द्विजवरै: संसेविते शाश्वते
सौख्यापादिनि खेदभेदिनि सुधसारै: फलैर्दीपिते।
चेत: पक्षिशिखामणे त्यज वृथासंचारमन्यैरलं
नित्यं शंकरपादपद्मयुगलीनीडे विहारं कुरु।।
(शिवानन्द 45)
अर्थात् हे चित्तरूपीपक्षिशिरोमणि! तुम इस सांसारिक वन के वृथा सञचार को छोड़ो, अन्य किसी वृक्ष की, अथवा जगंल की भी आशा मत करो, तुम तो केवल वेद वृक्षों के पल्लवों से समन्वित, ब्राह्मणवादियों से सेवित शाश्व्त–सौख्य–निरतिशय सुखों को देने वाले, त्रिविधताप को नष्ट करने वाले, तथा अमृत के समान धर्मार्थ काम व मोक्ष रूप फलों से प्रकाशित भगवान् शंकर के चरणकमलों के घोंसले में नित्य विहार करो।
यहाँ पर वेद को हीं वृक्ष कहा गया है। वेद वृक्ष की छाया में हीं साधक को शिव–साधना करते हुए विश्राम करने की कामना करनी चाहिए। इससे यह पता चलता है कि हमारी साधना कभी भी वेद विरूद्ध नहीं होनी चाहिए। कुछ शांकर पथ–पथिक साधना के नाम पर मनमाने पद्धतियों का आश्रयण लेते हैं जो मर्यादा के विरूद्ध है और उससे समाज को क्षति पहुँचने की आशंका बनी रहती है। शांकरीय शिक्षा कभी भी साधक को उच्छृंखल नहीं बनाती है।