शूलपाणि

आसुरी शक्तियों का विनाश करने के लिए त्रिशूल धारण करने के कारण शंकर शूलपाणि कहे जाते हैं। शंकर के शूल धारण के द्वारा यह बताया जा रहा है कि वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए स्वयं तत्पर रहते हैं न कि किसी और पर निर्भर रहते हैं। जैसे माता अपने शिशुओं की रक्षा भरण पोषण स्वयं करती है, वैसे हीं भगवान् अपने अनन्य भक्त की रक्षा स्वयं करते हैं। वे कैसे कल्याण करते हैं इसमें प्रमाण शूलपाणिता हीं है। दुष्टों का दमन और संतो का शमन करके वे उन्हें कल्याण का भागी बनाते हैं। शंकर स्वयं जगत नियंता हैं अत: प्रवृत्तिमार्गीयों और निवृत्तिमार्गीयों दोनों को हीं वश में रखते हैं। दुष्ट दण्ड से हीं डरकर सुपथ पर चलते हैं और सज्जन भयभीत होकर सुपथ का परित्याग नहीं करते। जिससे यह सृष्टि परंपरा ठीक से चलती रहती है इस शूल के द्वारा बहुत से असुरों के आसुरी भाव का विनाश हुआ।
यह शूलपाणि नाम स्वयं उपनिषद् ने उच्चरित किया है। महोपनिषद् के द्वितीय खण्ड का मंत्र शूलपाणि को प्रणाम करता है– त्र्यक्ष: शूलपाणि: पुरुष:। अत: यह भी वैदिक नाम हीं है।आध्यत्मिक अर्थ तो शूलपाणि का ब्रह्माकार वृत्ति के तरफ इशारा करता है। अपने मन को अपने स्वरूप से भेदन कर उसके कारण भूत अज्ञान को काटने वाली ब्रह्माकार वृत्ति हीं शूल है। यह वृत्ति जिसके हाथ में है वही शूलपाणि कहलाता है। भास्करराय शूलपाणि के सन्दर्भ में बड़ी सुन्दर सूक्ति प्रकट करते हैं–

शिव! तृप्तपुरस्य लिंगमध्ये प्रकट: संस्त्रिगुणात्मकाललोकै:।
शुचिशक्तिदशादिभिस्त्रिशूलं विदधत् त्वं प्रथितोSसि शूल्पाणिः||

हे शंकर! आप तृप्तपुर में शूल सहित प्रकट हुए इसलिए आप शूलपाणि कहलाते हैं। गुण,आत्मा, काल, लोक, अग्नि, शक्ति, दशा आदि त्रिकों से परिकल्पित त्रिशूल को धारण करने वाले हैं अत: आप शूलपाणि हैं। शूलपाणि के त्रिशूल की तीनों नोकें कई त्रिपुटियों की प्रतीक हैं।
सत्व, रज, तम ये तीन गुण हैं, इसे शिव हीं धारण करते हैं। प्रमात्रात्मा, साक्ष्यात्मा और परमात्मा अथवा जीवात्मा, ईवरात्मा और निर्विशेषात्मा ये तीन आत्माओं के रूप में अभिव्यक्त होकर इन्हें धारण करने वाले होने से शंकर शूलपाणि कहे जाते हैं।
भूत, भविष्य, वर्तमान ये तीनों काल शंकर के हीं अधीन हैं। स्वर्ग, मानुष और नरक इन तीनों लोकों का शासक शूलपाणि हीं है। गार्हपत्य, आहवनीय, अन्वाहार्यपचन, इन तीनों अग्नियों को शूलपाणि हीं धारण करते हैं।
ज्ञान, इच्छा और क्रिया इन तीनों शक्तियों को धारण करने वाले शूलपाणि है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति ये तीनों अवस्थायें शिव में हीं परिकल्पित है। सृष्टि, स्थिति, संहार ये तीनों प्रत्यय शिव के हीं अधीन हैं। ॠग्, यजु:, साम इन तीनों वेदों को धारण करने वाले शिव हीं है इसलिए शिव को शूलपाणि कहा जाता है।
वस्तुत: विषय, विषयी और विषयिता इन तीन राशियों में हीं सारा जगत् विभक्त है। इस त्रिकात्मक जगत् को धारण सदाशिव हीं करते हैं। पालन करते हुए समय पर इसका संहारक त्रिशूल हीं बनता है। गीता के अनुसार क्षर, अक्षर और उत्तम पुरुष, इस
त्रिक के परिज्ञान से हीं प्रपंच की आत्यन्तिक निवृत्ति संभव है। यह कार्य भी शूलपाणि की करुणा से संभव है।
बनारस में भगवान् शूलपाणि का मंदिर दर्शनीय है। सौरपुराण भी इस विषय में कहता है कि भगवान् विश्वनाथ का दर्शन करके लांगलीश का दर्शन करना चाहिए जहाँ पर बह्मादि देवता शूलपाणि की सेवा करते हैं–

अविमुक्तेश्वरं दृष्टवा लांगलीशं ततो ययौ।
त्तत्र ब्र्ह्मादयो देवा: सेवन्ते शूलपाणिनम्।।
भगवान् शूलपाणि से भक्त प्रार्थना करता है–
कालाराते: कराग्रे कृतवसतिरुर:शाणशातो रिपूणां
काले काले कुलाद्रिप्रवरतनयया कल्पितस्नेहलेप:।
पायान्न: पावकार्चि: प्रसरसखमुख: पापहन्ता नितान्तं
शूल: श्रीपादसेवाभजनरसजुषां पालनैकान्तशील:।।

(पादादिस्तो 4)
अर्थात् जो त्रिशूल हमेशा काल के भी काल महाकाल भगवान् शंकर के हाथ में रहता है और समय–समय पर पर्वतराजतनया पार्वती ने जिसका स्नेह रूपी लेप किया है, शत्रुओं के वक्षस्थल रूपी अग्नि की चिनगारियों से जिसकी धार तेज हो गयी है और जो लोग भगवान् के श्रीपादों की सेवा व भजन आदि रस का सेवन करते हैं उनके समस्त पापों को दूर करने वाला है। रक्षा करना हीं जिसका स्वभाव है ऐसा भगवान् शंकर का शूल हमारी सारी विपत्तियों से रक्षा करे।

 

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