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ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

शिपिविष्ट

भगवान् शंकर का यह नाम आध्यात्मिक अर्थों से परिपूर्ण है। यह नाम शिवनाम और विष्णुनाम दोनों में आया हुआ है। परम तत्व शिव सभी जीवों में अंतर्यामी रूप से प्रविष्ट हुए हैं। शिपि का अर्थ होता है–सीपी यानी सीतुहा और विष्ट का अर्थ होता है प्रवेश करना। जो सीतुहा में प्रवेश कर गया उसे हीं शिपविष्ट कहते हैं। यह सीतुहा और कोई नहीं, अज्ञान से बंधा हुआ पशु–अज्ञजीव हीं है। उन जीवों में अंतर्यामी रूप से रहने के कारण हीं शिव शिपिविष्ट कहलाते हैं।
यदि शिपिविष्ट शब्द को विष्णु परक समझा जाय तो विष्णुमूर्ति धारी शिव का यह नाम समझा जा सकता है। हरिनाम भी इसी तात्पर्य से समझा जा सकता है। सिद्धांत में तो शिव हीं जीव है क्योंकि संक्षेपशारीरककार सर्वज्ञ मुनि कहते हैं–ब्रह्मैव संसरति मुच्यते
च(3/7) विष्णुबोधक होने पर तैत्तरीयसंहिता को प्रमाण माना जाता है–
यज्ञो वै विष्णु: पशव: शिपि यज्ञ एव पशुषु प्रतितिष्ठति।
इस नाम का एक अर्थ भास्करदेव भी हैं। स्कंदपुराण में सूर्य को शिपिविष्ट कहा गया है। सूर्य भी भगवान् शंकर की प्रत्यक्ष मूर्ति है। शिपिविष्ट नाम भी वैदिक है–
नमो गिरिशयाय च शिपिविष्टाय च नम:।
आचार्य भास्कर की आलबाल इस नाम की व्याख्या यूँ करती है–

पशव: परमात्मनि धीविरहाद् द्विपदोSपि नराश्च सुरा: शिपय:।
तदनुग्रहकृद्धृदयं प्रविशन् प्रथितोSसि विभो! शिपिविष्ट इति।।

अर्थात् हे विभो! सृष्टि में दो पैर वाले मनुष्य या देवता, परमात्म ज्ञानहीन होने से पशु हीं कहे जाते हैं–वे हीं सीपी हैं, उनपर अनुग्रह करने वाले, आप उनके हृदय में प्रवेश करते हैं। अतएव आप शिपिविष्ट कहलाते हैं। जो शिव को अपने से अलग समझता है वह पशु हीं है ऐसी श्रुति कहती है। शिव यदि हमसे अभिन्न न होते तो हम जड़ या असत् ही होते। वह स्वरूप होकर हीं सबमें प्रविष्ट सा लगते हैं।
जीव रूप पशुओं की रक्षा के लिए आचार्य शंकर शिपिविष्ट के चरणों में मनोहारी स्तुति प्रस्तुत करते हैं–

क्रीडार्थं सृजसि प्रपञ्चमखिलं क्रीडामृगास्ते जना,
यत्कर्माचरितं मया च भवत: प्रीत्यै भवत्वेव तत्।
शम्भो स्वस्य कुतूहलस्य करणं मच्चेष्टितं निश्चितं,
तस्मान्मामकरक्षणं पशुपते कर्तव्यमेव त्वया।।

अर्थात् हे शम्भो! आप केवल अपनी क्रीडा के लिए ही इस सम्पूर्ण प्रपञ्च की रचना करते हो, इस प्रपञ्च में जितने भी प्राणिवर्ग हैं, वह सब आपके क्रीडार्थ मृग के समान हैं, हे भगवान् इस संसार में आकर मैंने यहाँ जो कुछ भी कर्म किया है, वह सब आपके प्रसन्नतता के लिए ही होवे। हे पशुपते! मेरी जितनी भी क्रियायें हैं, निश्चित ही वे एक तरह से कौतूहलपूर्ण हैं, अर्थात् केवल अपने मनोञ्जनार्थ,इसलिए मेरी रक्षा का भार भी सर्वथा आपके ही ऊपर है। अपने को शिवस्वरूप जानना हीं शिपिविष्ट की उपासना है।



 
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