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ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

अम्बिकानाथ

जगदम्बिका के स्वामी को हीं अम्बिकानाथ कहते हैं। सदाशिव अलग नहीं होते हुए भी, अलग सा होकर, नाथता को सनाथित करते हैं। लीलावपु से हीं वे प्रकृति बनकर, उस प्रकृति के नाथ यानि पुरुष बन जाते हैं। दृश्य वर्ग में जो भी है– ज्ञानेन्द्रियों से ग्राह्य–वह सब भगवती की कृपा कटाक्ष मात्रा का हीं परिणाम है। वे सम्पूर्ण जीवों को स्नेह से संवारने वाली प्रकृतिरूपा माता हैं। इस प्रकृति माता के हीं अधीश्वर होने से पुरुषोत्तम अम्बिकानाथ कहलाते हैं।
भगवान शंकर के संकेत पर हीं सृष्टि का सारा विलास चलता है। प्रकृति का सारा खेल अधिष्ठान (पुरुष) के हीं अधीन हैं अम्बिका के पति होने के लिए शिव ने स्वयं तप किया एवं भगवती ने उन्हें पतिरूप से प्राप्त करने के लिए घोर तप करके अर्पणा तक बनी। पार्वती के नामों में अम्बिका शब्द हलायुधकोष में प्रसिद्ध है–
आर्याSम्बिका मृडानी हैमवती पार्वती गौरी।
अतएव गौरी के शंकर को हीं अम्बिकानाथ कहते हैं। श्री भास्करराय अम्बिकानाथ की व्याख्या इस प्रकार करते हैं–

नाथसि हिमाचलमुमां मनसा तां नाथसेSथ तान्नथ:।
प्रकटोSसि देविकायां लिंगे तेनाम्बिकानाथ:।।

अर्थात् आप हिमाचल से अम्बिका की याचना करते हैं, मनसे अम्बिका की इच्छा करते हैं, उसके पति हैं तथा देविकाकृत में अम्बिकानाथेश्वर नाम से प्रतिष्ठित हैं इसलिए आप अम्बिकानाथ कहलाते हैं।
नाथ शब्द के अनेक अर्थ होने से हीं इस व्याख्या की कल्पना की गई है। आध्यात्मिक अर्थ में तो–चेतन के बिना जड़ प्रकृति कुछ भी करने में समर्थ नहीं है। प्रकृति का सारा शासन परमेश्वर हीं करता हैं। यहाँ सांख्यवाद के खण्डन की ध्वनि भी आती है जो मानते हैं कि प्रकृति हीं सब कुछ करने में समर्थ है। भगवान शंकर अम्बिका के समष्टि एवं व्यष्टि, दोनों रूपों के नाथ हैं।
एक विचित्र व्याख्या भी इस नाम की कि जा सकती है, अम्बिका; नाथ हैं जिसके ऐसे भोलेनाथ को अम्बिकानाथ कहते हैं। गृह में साम्राज्य तो गृहिणी का हीं चलता है। अम्बिकारूपी चरमवृत्ति का विषय होने से भी शिव को अम्बिकानाथ कहा जाता है।
भगवान् शंकर हमें स्वीकार करें ऐसी प्रार्थना आचार्य शंकर शिवानन्द लहरी में करते हैं–

कल्याणिनं सरसचित्रगतिं सवेगं, सर्वेंगितज्ञमनघं ध्रुवलक्षणाढ्यम्।
चेतस्तुरंगमधिरुह्य चर स्मरारे, नेत: समस्तजगतां वृषभाधिरूढ।।

हे स्मरारे! हे समस्तजननायक! हे वृषभवाहन! आप कल्याण कारक अर्था‍त् अच्छे लक्षणों वाले, सुन्दर व विचित्र गति–पदक्रम वाले, वेगपूर्वक चलने वाले, सभी के इशारे को समझने वाले, दृढ़ सिद्धन्तों नियमों–व्रतों को मानने वाले, मेरे चित्तरूपी घोड़े में चढ़कर, समस्त संसार में विचरण करो।
ब्रह्माकारवृत्ति द्वारा ब्रह्म को जानना हीं अम्बिकानाथ की उपासना है।





 
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