श्रीकण्ठ

ऐश्वर्य की आभा से उदीप्त कण्ठवाले भगवान् भोलेनाथ को हीं श्रीकण्ठ कहते हैं। शंकर के कंठ में हीं सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का वास है। भक्तों के लिए सतत भोगों की वर्षा श्रीकंठ के कंठ से होती रहती है। आजतक कामारी ने कभी भी किसी को कुछ देने में ‘ननुनच’ नहीं किया। कभी कभी तो जो नहीं देने लायक है उसे भी दे दिया। और स्वयं के दिये हुए वरदान से विपत्ति में भी फँस गए। संसारियों को संसारी भोग एवं परमहंसों को परमतत्व का दान तो औढ़रदानी देते हीं रहते हैं।
जिस समय समुद्रमंथन हो रहा था, उसी समय सबसे पहले भयंकर हलाहल प्रकट हो गया, लेकिन यह हल हीं नहीं निकल पा रहा था कि इसे कौन धारण करे। उस कालकूट की ज्वाला मात्र से हीं भगवान् विष्णु का रंग काला पड़ गया और वे श्याम सुन्दर हो गए। वहीं वामदेव अपनी वामा के साथ विराजमान थे और यह लीला देखकर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। भगवान् विष्णु को ध्यान आया–अरे! ये तो महादेव हीं धारण कर सकते हैं और किसी के वश की बात नहीं है। जब तक हम विचार करेंगे, यह जहर कहर बनकर सृष्टि को काल कवलित कर लेगा अत: चलें भक्तवत्सल भव के पास। श्री विष्णु पिनाकी से प्रार्थना करने लगे कि प्रभो! इस सृष्टि की रक्षा कीजिए और इस विषम विष का संहरण कीजिए–इधर भार्या आर्या की गंभीर मुद्रा मनाहि का संकेत दे रही थी और दूसरे तरफ अच्युत का आग्रह, उन्होनें दोनों का हीं मान रख लिया, पी भी लिया और नही भी पिया क्योंकि शंभु सर्वसमर्थ हैं। उस नीले गरल को अपने गले में हीं रखकर श्रीकंठ सदा के लिए नीलकंठ हो गए। कंठगत नीलिमा हीं श्रीकंठ की सुषुमा है। जिस समय शर्व सर्वनाश निवारण हेतु विष पी रहे थे, उस समय ब्रह्मा ने उनकी बड़ी प्रशंसा की– कि प्रभो! आपके कंठ की शोभा को यह नीलापन अत्यन्त बढ़ा रहा है आप ऐसे हीं बने रहिए। तब भस्मधारी ने उसे वहीं पर रोक दिया और श्रीकंठ हो गए।
वस्तुतः यदि विष बाहर रहा तो सृष्टि समाप्त हो जाती और अंदर जाता तो प्राणियों का
अंत हो जाता क्योंकि सारी सृष्टि उमेश्वर के उदर में निहित है अतएव उमापति ने उसे
बीच में हीं रोक लिया| वायुपुराण में यह कथा अत्यन्त विस्तार से दी गई है जो दर्श्नीय है¬-

ततोSहं पातुमारब्धे विषमन्तकसन्निभम्।
पिबतो मे महाघोरं विषं सुरभयंकरम्।।
कण्ठ: समभवतूर्णं कृष्णो मे वरवर्णिनि।
तं दृष्ट्वोत्पलपत्राभं कण्ठे सक्तमिवोरगम्।।
....‘अथोवाच महातेजा ब्रह्मा लोकपितामह:।
शोभसे त्वं महादेव कण्ठेनानेन सुव्रत।।
ततस्तस्य वच: श्रुत्त्वा मया गिरिवरात्मजे!
पश्यतां देवसंघानां दैत्यानां च वरानने।।
यक्षगन्धर्वभूतानां पिशाचोरगरक्षसाम्।
धृतं कण्ठे विषं घोरं नीलकण्ठस्ततो ह्यहम्।।

विषयविहीन वृषभवाहन को, विष भी विषमता के बयार में नहीं बहा सकता है। समर्थ की शोभा बन गया वह और भगवान और आदर्य बन गए।
महाभारत के अनुशासन पर्व में श्रीकंठ नाम की व्युत्पति अलग ढ़ंग से बतलायी गई है–इन्द्र ने ऐश्वर्य के मद में भगवान् भर्ग के ऊपर अपने भीषण कुलिश का प्रहार कर दिया उस समय वह बज्र, कंठ पर आ लगा और वहाँ थोड़ी सी नीलिमा उभर आयी, उस नीलिमा के कारण हीं नीलगल श्रीकंठ हो गए।

इन्द्रेण च पुरा वज्रं क्षिप्तं श्रीकांक्षिणा मम।
दग्ध्वा कण्ठं तु तद्यातं तेन श्रीकंठता मम।।

नानार्थरत्नमाला के अनुसार श्री शब्द का अर्थ विष भी होता है अत: विषधारण करने के कारण विष्णुवल्लभ श्रीकंठ कहलाये। आलवाल के अनुसार तो –

क्ष्वेलं गंगमिन्दो र्लेखामाद्योत्थां या कान्तिं कण्ठे।
बिभ्रन्माण्डल्येशे लिंगे विख्यातोSसि त्वं श्रीकंठ:।।

अर्थात् विष, गंगा, चन्द्रलेखा तथा कंठ में विषजन्य काँति को धारण करने के कारण आप श्रीकंठ कहलाते हैं। ‘श्री, कं, ठ’ ये तीनों जिसमें है वह है श्रीकंठ। श्री है विष, कं है गंगा और ठ यानि चंद्रमा। इन तीनों को धारण करने के कारण शंकर को श्रीकंठ कहते हैं।
गुरुदेव के अनुसार तो अविद्या से उपलक्षित परमब्रह्म की सबल मूर्ति ही श्रीकंठ है। वे अपनी माया से कल्पना कर भक्तों को अपना दर्शन दिखा देते हैं। श्रीकंठता से भगवान् की भ्क्तवत्सलता चमकती है कि वे हमपर कितने कृपालु हैं, जो हमारे लिए अकरणीय भी कर जाते हैं। अतएव भर्ग की भक्ति अवश्य करनी चाहिए। भगवान् हीं सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के अधिपति हैं यह समझकर ऐश्वर्य की भी याचना उन्हीं से होनी चाहिए। यही श्रीकंठ की उपासना है।

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