भक्तवत्सल

भक्तों को वात्सल्य दृष्टि से देखने के कारण भगवान् को भक्तवत्सल कहा जाता है। महादेव अपने भक्तों की रक्षा के लिए सतत सावधान रहते हैं और जैसे ही भक्त पुकारता है वे प्रकट हो जाते हैं। जैसे बछड़ा के अवाज मारते हीं गाय भागी हुई आ जाती है। जैसे माता–पिता निरंतर बच्चे का मंगल हीं सोचते है। वैसे ही जगत् पिता महेश्वर सदा हमारे कल्याण कामी हैं। माँ जैसे हजारो अवगुण होने पर भी अपने बालक में अवगुण नहीं देखती है वैसे ही महादेव का हृदय है इसीलिए तो सबका संग्रह कर लेते हैं।
व्यवहारिक जगत् में बड़े लोग छोटे लोगों के साथ बैठना पसंद नहीं करते हैं और शादी ब्याह में तो विशेष ध्यान रखा जाता है। संगी साथी बन–ठन कर पहुँचते हैं और अपनी विशेषता का प्रदर्शन करते हैं पर महादेव ने ऐसा कुछ नहीं किया। भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल, यक्ष, किन्नर, नाग, पन्नग, असुर, दानव, दैत्य सबको अपने साथ में ले लिया। किसी को अच्छा लगे या बुरा लेकिन शिव ने अपने साथियों का साथ नहीं छोड़ा। शंकर की बारात में एकमुखी, द्विमुखी, उदरमुखी, शूलमुखी, बहुमुखी, एकपाद, त्रिपाद, बहुपाद, कबंध, कंकाल, विकृतानन सब शामिल हुए। सबको समान सम्मान देने से शिव की भक्त वत्सलता का परिचय प्राप्त होता है।
शम्भु सा दयालु इस दुनिया में कोई और दिखाई नहीं देता है। थोड़ी सी प्रार्थना और कितनी सारी प्रसन्नता। इसलीए तो वे पापी को भी भोग और मोक्ष सुलभ करा देते हैं। काशी में अखण्ड मोक्ष का भण्डारा इसी बात का प्रमाण है। नहीं देखते कि इसने पाप किया या पुण्य। सबको नम: शिवाय रूप तारक मन्त्र देकर मुक्त कर देते हैं। शिव की पूजा भी इसीलिए अत्यन्त सरल है कहा भी है–

मूर्ति मृ‍र्दा बिल्वदलेन पूजा अयत्नसाध्यं वदनं च वाद्यम्।
फलं च यत् तत् मनसोभिलाषं नि:सेव्य विश्वेश्वर एव देव:।।

मिट्टी की तो मूर्ति बनाई, एक लोटा पानी चढ़ाया और उसके बाद उस पर बिल्वपत्र चढ़ाकर, अपने मुँह से हीं बकरे की आवाज़ निकाल कर महादेव को प्रसन्न कर लिया और फल कितना बड़ा कि जो भी मन की कामना है वह पूर्ण हो जाती है। इसे हीं कहावत में कहते हैं–हींग लगे न पिफटकरी रंग चढ़ै चोखा। भगवान् भोलेनाथ भक्तवत्सल हैं इसलिए तो यह संभव है।
अप्यय दीक्षित भी कहते हैं–

अर्कद्रोण प्रभृतिकुसुमैरर्चनं ते विधेयं
प्राप्यं तेSज स्मरहरफलं मोक्षसाम्राज्यलक्ष्मी:।

आक धतूरे के फूलों से भी पूजा करने पर आप मोक्ष साम्राज्य लक्ष्मी का दान कर देते हैं। वस्तुत: भगवान् चढ़ाए भोग को नहीं, भक्त के भाव को देखते हैं क्योंकि उनमें किसी पदार्थ की कमी तो है हीं नहीं। क्या गंगाधर के पास जल की कमी है, जो हमारे लोटे भर जल की अकांक्षा करेंगे? क्या त्रिनेत्र के पास तम है जो हमारे तेल के दिये के लिए तरसेंगे? क्या नित्यतृप्त को भूख सताती है, जो हमसे फल मिष्ठान की मिन्नतें करेंगे? जो सारे संसार को फल देते हैं उन्हें हम क्या फल दे सकते हैं। हम तो उन्हीं की वस्तुओं को उनके चरणों में समर्पित करते हैं। फिर भी भगवान् अपनी वत्सलता की वर्षा हमारे ऊपर करते रहते हैं इसलिए तो वे भक्तवत्सल कहे जाते हैं। शिव की कृपा प्राणीमात्रा पर समान हैं फिर भी वात्सल्य तो भक्तों के ऊपर हीं है क्योंकि भक्त हीं उनका वत्स है–बालक है।

दासानुरस्यावपसीति तर्णकान् भक्तात्मकानोदनबालकोभयम्।
पोषाय गृह्णास्यथ तेषु सौहृदं पुष्णासि तस्मादसि भक्तवत्सल:।।

अर्थात् आप अपने भक्तों को छाती से लगा लेते हैं, भक्तरूप बच्चों को अपना बना लेते हैं, भात और बालक दोनों को ग्रहण करते हैं जिससे बालक को खिलाकर उसका पोषण किया जा सके। भक्तों पर अतिशय प्रेम रखने के कारण आप भक्तवत्सल हैं। भगवान् की भक्तवत्सलता को हीं देखकर भक्त कह उठता है कि भगवन्! आप पहाड़ों में क्यों घुमते हैं इसका रहस्य मैं अच्छी तरीके से जानता हूँ क्योंकि मेरे कठोर चित्त में आपके चरण पड़ने वाले हैं।

एष्यत्येष जनिं मनोSस्य कठिनं तस्मिन्नटानीति मद्–
रक्षायै गिरिसीम्नि कोमलपदन्यास: पुराभ्यासित:।
नो चेद्दिव्यगृहान्तरेषु, सुमनस्तल्पेषु वेद्यादिषु,
प्राय: सत्सु शिलातलेषु नटनं शम्भो किमर्थं तव।।

अर्थात् हे शम्भो! यह भक्त जन, पुन: इस संसार में जन्म ग्रहण करेगा, इसका मन अत्यन्त कठिन है, अत: मैं (अपने चरणों को मजबूत बनाने के लिये) निरन्तर इसके मन में भ्रमण करूँगा, यह सब सोचकर ही, मेरी रक्षा की दृष्टि से ही, आपने फर अपने कोमल चरणों से गिरिगुहाओं में घूमने का अभ्यास प्रारम्भ कर दिया है क्या? अन्यथा तो आप किसी एक जगह बैठे रहते। प्राय: दिव्य गुहाओं में, कुसुमतल्पों में, चबूतरों और सुन्दर शिलाओं में व्यर्थ विहार क्यों करते। भक्तों पर करुणा के कारण हीं ये सारे कृत्य आप करते हैं।

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देवों के देव महादेव हैं अद्वितीय...

भारत के गरिमायुक्त ग्रंथ शिवपुराण में शिव और शक्ति में समानता बताई गई है और कहा गया है कि दोनों को एक-दूसरे की जरूरत रहती है। न तो शिव के बिना शक्ति का अस्तित्व है और न शक्ति के बिना शिव का। शिव पुराण में यह भी दर्ज है कि जो शक्ति संपन्न हैं, उनके स्वरूप में कोई अंतर नहीं मानना चाहिए। भगवती पराशक्ति उमा ने इंद्र-आदि समस्त देवताओं से स्वयं कहा है कि ‘मैं ही परब्रह्म, परम-ज्योति, प्रणव-रूपिणी तथा युगल रूप धारिणी हूं।

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