सारे जड़ चेतन का अधिष्ठान होने से शिव को भव कहा जाता है। आप संसार रूप हैं इसलिए भी भव कहे जाते हैं। शतरूद्रसंहिता भव का अर्थ जल बतलाती है–
संजीवनं समस्तस्य जगत: सलिलात्मकम्।
भव इत्युच्यते रूपं भवस्य परमात्मन:।।
सम्पूर्ण जगत् के जीवन का कारण यह जल हीं है। आप इससे प्राणियों को जीवित रखते हैं और पंचतत्व भी आप से हीं प्रकट हुआ है अत: आप भव कहलाते हैं। सदाशिव को जलमूति मानकर नमस्कार किया जाता है–भवाय जलमूर्तये नम:। कालिदास ने भी भगवान् शंकर के अष्टमूर्ति को प्रत्यक्ष बतलाते हुए प्रणाम किया है–
या सृष्टि: स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हवि र्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत: श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहु: सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिन: प्राणवन्त:
प्रत्यक्षाभि:प्रपन्नस्तनुभिरवतु व: ताभिरष्टाभिरीश:।।
अथवा जिससे या जिसमें सब होता है उसे भव कहा जाता है। जो सबका होना करता है या सबके द्वारा आदृत है वह भव कहलाता है। भव शब्द की व्याख्या भास्करराय इस प्रकार करते हैं–
सत्तामात्रामधिष्ठानमुपादानमसि विश्वस्य।
सलिलस्याधिष्ठात्री मूर्तिस्तव तेन विश्रुतोSसि भव:।।
अर्थात् आप केवल सत्तारूप हैं, प्रपंच के अधिष्ठान तथा उपादान हैं, जलतत्व की अधिष्ठात्री आपकी भवमूर्ति है अत: आप भवनाम से कहे जाते हैं। भगवान् भव की आध्यात्मिक उपासना है सर्वबाध का अभ्यास। शिव से अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है इस बात को समझना।