शर्व–सर्व कष्टो को नष्ट करने वाले हैं। ‘शृणाति इति शर्व:’ अर्थात् जो संहार करे वह है शर्व। भगवान् भक्तवत्सल होने से भक्तों के कष्ट का नाश करते ही हैं। वे भवरूप से उपासना करने पर शर्व हो जाते हैं।
‘नम: शर्वाय’ कहकर वेद भगवान् भी इस नाम की महत्ता बतला रहे हैं। भगवान् औढ़रदानी सम्पूर्ण विपदों के विनाश में समर्थ हैं। भगवान् शिव गीता में स्वयं कहते हैं–
तत: सर्वं परित्यज्य मद्भक्तिं समुदाहर।
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।।।
संकट काटने में शम्भु का कोई सानी नहीं है। वे इतने दयालु है कि तुरन्त ही द्रवित हो जाते हैं। देवताओं से जब कोई कार्य असाध्य हो जाता है तब नीलकण्ठ ही उसे साधते हैं। जैसे आप बाहर के दु:खनिमित्तो को नष्ट करते हैं वैसे ही अन्दर के अज्ञान निमित्तों को भी समाप्त करते हैं। गंगाधर की गर्वापहारिता तो प्रसिद्ध है। शिवपुराण के अनुसार –
गर्वापहारी भगवान्नानालीला विशारद:।
नाशयिष्यति ते गर्वमिदानीं भक्तवत्सल:।।
बाणासुर को जब गर्व हो गया तब भगवान् ने उसके गर्व को खर्व करने का उपाय किया। कामदेव का अहं नाश तो वामदेव ने हीं किया। दक्ष और ब्रह्मा की अभिमान शीलता भी शम्भु के द्वारा शीर्ण हो गई। ॠषियों के अहंकार को चूरचूर, भगवान् अपनी दारुक वन लीला में करते हैं। जिस समय नृसिंह का क्रोध, सारे जगत को कष्ट देने लगा तब वीरभद्रमूर्ति होकर शंकर जी ने उसका शमन किया। स्वभावस्थ होने पर श्रीहरि ने प्रार्थना की–
यदा–यदा ममाज्ञेयं मति: स्याद् गर्वदूषिता।
तदा तदाSपनेतव्या त्वयैव परमेश्वर।।
हे प्रभो! मेरे मति में जब–जब गर्व का प्रदूषण आये तब–तब आप ही इसे नष्ट करते रहिएगा। आचार्य भास्कर के अनुसार–जो यह नानाकार जगत् प्रतीत हो रहा है उसे प्रलय काल में आप उपसंहृत कर लेते हैं, पृथ्वी आपकी अधिष्ठात्री मूर्ति है इसलिये आप शर्व कहे जाते हैं–
यदेतदाभाति बहुप्रकारं जगत् तदन्ते सकलं श्रृणासि।
अधिष्ठितो मध्यमदेशलिंगे धरण्यधिष्ठातृतयापि शर्व:।।
अध्यात्म में तो अविद्या निवृति द्वारा पुनरागमन रूपी कष्टापनयन हीं शर्व की उपासना है। भगवान् शंकर हीं इस अज्ञान अंतक का अंत करने वाले हैं। इस अंतकांतक का अद्भूत वर्णन आचार्य श्री भगवतपाद् अपने शिवानन्दलहरी में करते हैं–
किं ब्रूमस्तव साहसं पशुपते कस्यास्ति शम्भो भवद्
धैर्यं चेद्दृशमात्मन: स्थितिरियं चान्यै: कथं लभ्यते।
भ्रश्यद्देवगणं त्रसन्मुनिगणं, नश्यत्प्रपञ्चं लयं,
पश्यन् निर्भय एक एव विहरत्यानन्दसान्द्रो भवान्।।
हे पशुपते! आपके साहस के विषय में हम क्या कहें? हे शम्भो! आपके समान धैर्यशाली अन्य कौन देवता है। अन्य देवताओं के द्वारा इस प्रकार की निश्चलात्मक स्थिति कैसे प्राप्त हो सकती है? क्योंकि प्रलयकाल में जिस समय देवताओं का धैर्य डिग जाता है, और मुनिगण भी त्रस्त हो जाते हैं, यह सारा प्रपञ्च जब नष्ट–भ्रष्ट हो जाता है, ऐसे महाभयंकर प्रलयकाल को भी, निर्भयतापूर्वक अकेले देखते हुए, आप आनन्दघनरूप में स्थित होकर विहरण करते हैं। इसलिए आप शर्व कहें जाते हैं।