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ॐ नम: शिवाय |
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श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी |
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शिव के 108 नाम |
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| महेश्वर |
माया के अधिपति होने से शिव को महेश्वर कहा जाता है। जो सारे संसार का नियमन अपनी शक्तियों के सहारे करता है और शक्ति को भी अपने वश में रखता है उसे हीं वेद भगवान् महेश्वर कहते हैं। श्वेताश्वतरश्रुति इस नाम का गान करती है–मायिनं तु महेश्वरं (श्वेत 4,10) परमं महेश्वरं (श्वेत 6,7) महेश्वर हीं सबसे उत्कृष्ट हैं और वे हीं सम्पूर्ण प्रकृति के ऊपर एकाधिकार रखते हैं। जगत् में जो कुछ भी महान् है उन सबके शासक भगवान शंकर हैं। जड़, चेतन इन दोनों का शासन महेश्वर के हाथ में हीं है। इसलिए तो महेश्वर भक्त उपमन्यु कहते हैं कि शंकर के अतिरिक्त मुझे और किसी की कथा अच्छी नही लगती क्योंकि सभी महेश्वर के वशीभूत हैं। |
सत्यं सत्यं हि न: शक्र वाक्यमेतत्सु्निश्चितं।
न यन्महेश्वरं मुक्त्वा कथान्या मम रोचते।। |
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हे इन्द्र! यह सुनिश्चित और सत्य वचन है कि महेश्वर को छोड़कर, मुझे किसी और की बात अच्छी नहीं लगती। महेश्वर शब्द के संबंध् में ब्रह्मवैवर्तपुराण इस प्रकार बतलाता है– |
विश्वस्थानां च सर्वेषां महतामीश्वर: स्वयम्।
महेश्वरं च तेनेमं प्रवदन्ति मनीषिण:।। |
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अर्थात् विश्व के अंदर जो कुछ भी है उस सबके ईश्वर होने से शिव को महेश्वर कहा जाता है। महेश्वर की महेश्वरता यही है कि संसार के महान व्यक्तियों का, जैसे इन्द्रादि देवता, उनका भी शासन करते हैं। वे केवल माया मात्र के शासक नहीं हैं। माया के जितने कार्य हैं उसके भी शासक हैं। श्रुतियाँ इस संबंध् में स्वयं प्रमाण हैं। उसके भय से हीं वायु बहती है, उसके भय से हीं अग्नि जलता है, उसके डर से हीं सूर्य और चन्द्रमा अपनी मर्यादा में रहकर सतत परिभ्रमण करते हुए दिन और रात का नियमन करते हैं। उसके भय से हीं जल सबको जीवनी शक्ति प्रदान करता है। पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है। चन्द्रमा पृथ्वी का चक्कर लगाता है। सारे ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं और कहीं कोई किसी से नहीं टकराता है। यह महेश्वर की शक्ति का हीं कमाल है। आलवाल तो इस नाम की व्याख्या यों करता है– |
तवेश्वरत्वं त्रिजगद्विलक्षणं त्वमीश्वराणां महतामपीश्वर:।
जगत्तिरोधानकर: श्रुतीरितस्त्वं पञ्चविंशोSपि परो महेश्वर:।। |
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अर्थात् तीनों लोकों से विलक्षण आपकी ईश्वरता है, आप महान शासकों के भी शासक हैं, आप जगत् का तिरोधान करने वाले हैं, आप वेद के द्वारा बताए जाते हैं और चन्द्रशेखर आदि पच्चीस रूप होने पर भी उनसे परे हैं इसलिए आप महेश्वर कहे जाते हैं।
लोक में यह बात देखी जाती है कि शासक भी किसी न किसी के द्वारा शासित होता है। लेकिन महेश्वर शासन करते हुए भी किसी के द्वारा शासित नहीं होते हैं इसलिए वे महादेव कहे जाते हैं। यही महादेव की विलक्षणता है। कहीं कहीं शीघ्र व्याप्त करने वाले अथवा शीघ्र वर देने वाला होने के कारण आपको महेश्वर कहा जाता है। सोमस्कंध्, उमामहेश्वर आदि मूर्तियाँ होने पर भी निराकार होने के कारण आप इन मूर्तियाँ से परे हैं अथवा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेर्न्द्रियाँ, पंच प्राण, पंच क्लेश, अंत:करण चतुष्टय और कर्म इन पच्चीसों में अध्यास करने वाला जो जीव, ये सब भगवद् रूप हैं और इनसे आप परे हैं इसलिए आप महेश्वर कहे जाते हैं। महेश्वर की उपासना मायिक संसार से मुक्ति के लिए की जाती है। वे हीं ज्ञान द्वारा अपनी माया को बाधित कर अपने स्वरूप को लखा देते हैं।
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शिव कथा |
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मकर संक्राति |
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शिव नाम प्रवचन |
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महा शिव रात्रि |
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संर्पक
श्री वेदनाथ महादेव मंदिर
एफ / आर - 4 फेस – 1,
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दूरभाष : 09312473725, 09873702316,
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