तीनों लोकों के स्वामी होने के कारण शंकर को त्रिलोकेश कहा जाता है। तीनों लोकों को बनाकर, उसमें प्रवेश कर, अंदर और बाहर से उसका नियमन करने के कारण सदाशिव तीनोंलोकों के शासक कहे जाते हैं। तीनों लोकों से–स्वर्ग, पाताल और पृथ्वी का ग्रहण करना चाहिए। यहाँ के प्राणी, उन लोकों का नियमन, शंकर से हीं संभव है। वस्तुत: त्रिलोकीनाथ की यह अत्यन्त विचित्र लीला है। वे विश्व का निर्माण कर, अपने वैभवों से इसे जीवित रखकर, निखिल प्रपंच को अपने स्वरूप में लीन कर स्वयं मोक्ष चाहते हैं। जिससे संसार का उत्थान पतन रूप कंदुकक्रीड़ा की थकान उतर जाय। इस भाव को काश्मीरकशैव जगद्धर भट्ट ने बड़े हीं सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है–
इत्येवं भगवन्नबन्ध्यमहिमा निर्माय निर्मानुषं
विश्वं विश्वसितं वितत्य तदनु स्फीतैर्विभूति क्रमै:।
संहृत्याथ निजे महिम्नि निखिलं तत्कन्दुकान्दोलन–
क्लेशावेशविरामसंभृतसुखं कैवल्यमाकाङ्क्षसि।।
भव, भुवनों का पालन उनसे अलग रहकर नहीं करते। वे तदनुरूप बन जाते हैं। वे केवल मिट्टी की तरह उपदान या कुम्हार की तरह निमित्त कारण या राजा की तरह शासक नहीं है–वे तीनों की तरह तीनों हीं बन जाते हैं। ईश्वर के पाँच कृत्यों में जन्म, स्थिति, नाश, प्रवेश व नियमन है। नियमन भी दो प्रकार का होता है–अन्तर्यमन और बहिर्यमन। अन्तयरमी रूप से परमात्मा हीं अन्तर्यमन करता है और वही कर्म फलदाता रूप से बहिर्यमन करता है। यदि उस परमेश्वर का शासन न हो तो सारा संसार छिन्न–भिन्न हो जायेगा। सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा, तारे, नक्षत्र, निहारिकायें, आकाशगंगायें और धूमकेतु आपस में हीं टकराकर एक हीं क्षण में प्रलय मचा देंगे। कोई है जो इनकी गति का नियमन करता है। इनके पथ का निर्देशन करता है कि कितनी दूरी और कितनी गति से संचरण करना चाहिए। जब प्रलय की आवश्यकता होती है तो अपना तांडव नृत्य कर, सब समाप्त कर देता है। भास्करराय के अनुसार तो–
ऊर्ध्वाधोम्ध्यभुवाम् अमरासुरमानवप्रकरनिबिडानाम्।
अन्तर्यमनात् त्रिपुटीसाक्षितया शंकर! त्रिलोकीशस्त्वम्।।
अर्थात् हे शंकर! आप देवताओं, असुरों और मानवों के समूहों से घटित ऊर्ध्वभुवन, अधोभुवन और मध्यभुवन के अंतर्यामी होने से तथा त्रिपुटी के साक्षी होने से आप त्रिलोकीश कहे जाते हैं।