कमनीय कर्पूरकान्तिमान का कण्ठ भी तो कुन्दधवल होगा। जब संपूर्ण कलेवर हीं गिरवर की तरह उजला है तो फिर कण्ठ का क्या कहना! वस्तुत: विषपान के कारण जो कण्ठ का मय बिन्दु था वह उज्वल से कज्जलमय हो गया। उससे उसकी श्वेतिमा में चार चाँद और लग गये। जिससे गौरीनाथ शितिकण्ठ हो गये। भगवान् नीलकण्ठ हैं, तो श्वेतकण्ठ भी हैं। जहाँ वे उग्र कण्ठ होते हैं, वहीं पर श्रीकण्ठ भी बन जाते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार नीलिमा पूर्व की श्वेतिमा का यह वर्णन है। जो भी हो–भगवान् दोनों रूप से सुशोभित होते हैं।
आचार्य यास्क के अनुसार तो सारा व्यक्त प्रपंच जिनके कण्ठ में सूक्ष्म रूप से रहता है वे महादेव हीं शितिकण्ठ हैं अथवा सूक्ष्म आत्मा के ज्ञान में इसे लाक्षणिक मानकर, आत्मोपदेश, सतत जिनके कण्ठ से बहते रहता है, वे शंकर शितिकण्ठ कहे जाते हैं।
रुद्राध्याय भी इस नाम से शिव को पुकारता है– नमो नीलग्रीवाय च शितिकण्ठाय च नम:। शिति का एक अर्थ काल भी होता है। तब काल है जिसके कण्ठ में ऐसे कालकण्ठ को शितिकण्ठ नाम से पुकारा जाता है। पूर्व नाम में वास्तविक अविद्याराहित्य शितिकण्ठ से हीं कहा जाता है। परमार्थत: वेद में अध्कितर स्थलों पर शुद्ध ब्रह्म का प्रतिपादन करने कारण हीं वे शितिकण्ठ कहे जाते हैं। शिति शब्द का कहीं–कहीं अर्थ नीला भी किया जाता है, तब यह नीलग्रीव के समानार्थी हो जाता है। इसी अर्थ का समर्थन भास्करराय ने किया है–
दधदधिगलमिन्द्रपविप्रहृतिप्रभवं कालम्।
कालञ्जरगिरिशिखरे प्रथितस्त्वं शितिकण्ठ:।।
अर्थात् इन्द्र के वज्र के प्रहार से हुए कालिमा को गले में धारण करने से आप शितिकण्ठ हैं। नीलग्रीव नाम से जिस ब्रह्म को अविद्या के सहित बतलाया गया था, उसी का यहाँ शुद्धरूप से प्रतिपादन किया गया है।
ऐसे नीलकण्ठ का ध्यान भगवतपाद् अपने शिवानन्द लहरी में बतलाते हैं–
आकाशेन शिखी समस्तपफणिनां नेत्रा कलापी नता–
नुग्राहिप्रणवोपदेशनिनदै: केकीति यो गीयते।
श्यामां शैलसमुद्भवां घनरुचिं दृष्ट्वा नटन्तं मुदा,
वेदान्तोपवने विहाररसिकं तं नीलकण्ठं भजे।।
जिस प्रकार उपवन में स्थित मयूर, पर्वतों में उठने वाली काली घन घटाओं से व्याप्त आकाश को देखकर, हर्ष से ओंकार की तरह निम्नोन्नत ध्वनि के द्वारा शिखावाला, कलाप पंख वाला, होता हुआ भी, केकी अर्थात् केका मधुर व सान्द्र ध्वनि युक्त होकर नाचता रहता है, इसी प्रकार भगवान् शिव भी, वेदान्तरुपी उपवन में शैलसुता सौन्दर्यशिरोमणि श्यामा पार्वती को देखकर नाचते हैं, ऐसे विहाररसिक नीलकण्ठ (शिव) का मैं ध्यान करता हूँ।
शुद्ध को समझना हीं शितिकण्ठ की सुन्दर उपासना है।