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ॐ नम: शिवाय      ॐ नम:शिवाय     ॐ नम: शिवाय      ॐ नम:शिवाय     ॐ नम: शिवाय
ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

शिवाप्रिय

ब्रह्मविद्या रूप से शिवा के प्रिय होने से शंकर शिवाप्रिय कहलाते हैं। बिना ब्रह्मविद्या रूप शिवा के कोई भी ब्रह्मविद् नहीं हो सकता है। जितना भगवान् शंकर उमा से प्रेम करते हैं उससे भी अधिक उमा का शंकर के प्रति सोत्साह प्रेम है। शंकर को प्राप्त करने के लिए वे घोर से घोर तप की अग्नि में भी अपने को तपाने से नहीं हिचकिचाती। कठिन परीक्षा के पलों में भी वे अविचलित रहती हैं और अंत में शिव को स्वयं वहाँ अवतरित होना पड़ता है और कहना पड़ता है कि! तुमने अपने प्रेम और तप के द्वारा मुझे खरीद लिया। मैं तो तुम्हारा कीना हुआ दास हो गया। अब तुम्हारे बिना एक क्षण भी मुझे युग की तरह प्रतीत होता है। हे प्रिये! अब तो सदा के लिए कैलाश के तरफ हीं चलो। लेकिन शिवा में प्रेम के साथ हीं मर्यादा भी है। लोग यह न कह डाले कि शंकर ने भगाकर भार्या बना लिया। अत: समाज, परिवार की सहमति भी जरूरी है और इसे शिव ने भी स्वीकार किया। ऐसे तो शिवा–शिव की सनातनी सीमन्तिनी है। फिर भी आदर्श का प्रदर्शन, पथ दर्शन के लिए पूजनीय होता है।
दूसरे व्याख्या के अनुसार शिवा जिनकी प्रिया हैं, पत्नी है वे हैं शंकर शिवाप्रिया। भक्त कल्याण के लिए ही अनुग्रह शक्ति को धारण करते हैं, क्योंकि शिवा साक्षात् अनुग्रह शक्तिरूपा है।
अध्यात्म में तो शिवा जगत् उत्पत्ति की निमित्त शक्ति है। निमित्त शक्ति, शिव की प्रीति के लिए हीं जगत् का निर्माण करती है अत: शिवाप्रिय हैं उमेश्वर।
विचार करने पर अम्बिकानाथ एवं श्रीकण्ठ के द्वारा जहाँ पर निग्रह शक्ति की प्रधनता का वर्णन था, वहीं पर शितिकण्ठ और शिवाप्रिया के द्वारा अनुग्रह शक्ति की प्रधानता बतलायी जाती है। इसे अध्यारोप एवं अपवाद के द्वारा सम्झा जा सकता है। यह शिवा हीं विज्ञान शक्ति है। इस विज्ञान शक्ति रूप शिवा का वर्णन हीं भास्कर राय इस प्रकार करते हैं–

मतिर्धृतिः कृतिर्बलं शरीरमिन्द्रियं मन:।
समस्तमेव ते शिवा भवानत: शिवाप्रिय:।।

आपके बुद्धि, धैर्य, यत्न, सामर्थ्य, शरीर, इन्द्रिय, मन आदि सब शिवारूप ही हैं अत: आप शिवाप्रिय हैं। यहाँ शरीर पुरुष है, मन प्रकृति है, मति महान है, कृति अहंकार है, पंचतन्मात्रायें बल है, इन्द्रिय इन्द्रियाँ है और धृति महाभूत है। ये सब के सब माया रूप शिवा हीं है। इस सबको प्रेम करने के कारण आप शिवाप्रिय हैं।
भगवान् मे कल्पित जितने सविशेष हैं वे सब शिवारूप हीं है। बुद्धि से इच्छा, धैर्य से अधिष्ठानता, अभिव्यक्ति से यत्न, सामर्थ्य से नियमन शक्ति, शरीर से माया, इन्द्रिय से सर्ववित्त्व का प्रयोजक और मन से सर्वज्ञत्व का प्रयोजक समझना चाहिये।
श्रौत क्रम से अर्थ क्रम को बलवान मानकर इसका अर्थ यूँ भी समझा जा सकता है। शरीर तादात्म्य वाला ही पुरुष होता है अत: उसे शरीरपद से कहा गया। मन का उपादान प्रकृति है अतएव वह मन नाम से कहा गया। प्रकृति का विकार होने के कारण महान मति है। बुद्धि का हेतु होने से कृति अहंकार है। दृश्यमान प्रपञ्च बनने की सामर्थ्य होने से उन्हें बल कहा जाता है। इन्द्रिय स्वशब्द से कही गयी है। स्थूल महाभूत हीं व्यक्त जगत् को धारण करते है अतएव वे धृति शब्द से कहे गये हैं। ये सभी मायारूप हीं है। इन सबको भोगने वाला पुरुष भी माया हीं है। क्योंकि उपलक्षित की वास्तविकता प्रकट होने पर विशिष्ट की मायिकता असंदिग्ध होती है। यही शिवाप्रिय की उपासना है।


 
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  कार्यक्रम
 
  शिव कथा
    मकर संक्राति
    शिव नाम प्रवचन
    महा शिव रात्रि
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संर्पक

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