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ॐ नम: शिवाय      ॐ नम:शिवाय     ॐ नम: शिवाय      ॐ नम:शिवाय     ॐ नम: शिवाय
ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

उग्र:

आसुरी शक्तियों के विनाश के लिये शंकर उग्ररूप धारण करते हैं अतएव वह उग्र कहे जाते हैं। अनुग्रह शक्ति की सार्थकता इसी में है कि वह विग्रह शक्ति के साथ सुशोभित हो। शिव यदि दयालु है, तो उनकी दया का दुरूपयोग दानवी शक्तियाँ करने लगती है अतएव उन्हें उग्र रूप भी धारण करना पड़ता है। स्वयं भस्मासुरादि को वरदान देकर शक्तिसंपन्न बना देते हैं, तो समय आने पर उसी शक्ति के द्वारा वे उसका विनाश भी कर डालते हैं। शिव का यह उग्रवाद समाज में समताशक्ति का साम्यवाद है। स्वयं शिव त्रिपुरासुर, गजासुर, अन्धकासुरादि का विनाश अपने त्रिशूल से करते हैं।
वेद भी इस नाम से शंकर को नमन करता है – नम: उग्राय। अभिनव शंकराचार्य के अनुसार उग्र शब्द श्रेष्ठता का वाचक है। श्रेष्ठ गुणों को धारण करने के कारण ही शिव उग्र कहे जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अन्दर जो आसुरी शक्ति बतलाई गई है–दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध्, काम, लोभ। जो ज्ञान–भक्ति के मार्ग में बाधक है, उन अवगुणों का संहार करने के कारण भी आप उग्र कहे जाते हैं।
वस्तुत: यहाँ पर शिवा प्राप्ति के साधन के तरफ इशारा किया गया है। प्रतिपक्षनिवृति के बिना मन शिवाकार बन नहीं सकता अत: सबल हो उसका नाश अपेक्षित है। निरोध की वृति पर आरूढ़ होकर शिव ही उसके नाशक है। जैसे सूर्य ही किरणों के द्वारा आतीसी शीशा में प्रवेश कर अग्निरूप लेकर वस्तु का नाश करता है। वैसे ही शिव ही वृति में प्रवेश कर अविद्या का नाश करते हैं।
महाभारत के अनुसार महेश्वर ने स्वयं अपने उग्र स्वरूप का रहस्य समझाया है–लोक में अग्नि और सोम ये दो भाव है–एक गर्म तथा दूसरा शीतल। विष्णु में सोम आप है तथा मैं अग्निभव से प्रतिष्ठित शरीर से सब लोको को धारण करता हूँ। यह रूप विकराल है, इसमें नेत्र भी सरोष है और शूल आदि आयुध भी धारण कर रखें है ऐसा रूप हीं शिव का उग्र कहा जाता है।
भास्कर आचार्य के अनुसार तो– आप सब लोगों में व्याप्त हैं। संसार से अतीत है, वायुतत्व के अधिष्ठाता है और कनखल क्षेत्रा में उग्रेश्वर लिंगरूप से प्रतिष्ठित है अतएव आप उग्र कहे जाते हैं–

उच्यस्यन्त र्निखिलजनानामुद्रच्छस्यप्यथ जगदूर्ध्वम्।
प्रव्य्क्त: सन् कनखललिंगे वायोरन्तर्वससि तदुग्र:।।

शिवपुराण के अन्दर महेश्वर की उग्ररूपता का इस प्रकार वर्णन मिलता है–

बहिरन्तर्जगद्विश्वं बिभर्ति स्पन्दते स्वयम्।
उग्र इत्युच्यते सद्भीरूपमुग्रस्य सत्प्रभो!।।

अन्तर्जगत् और बहिर्जगत् का पालन करने के कारण और उनमें स्वयं स्पन्दित होने के कारण, विद्वान् लोग आपको उग्र नाम से पुकारते हैं।
अपने अन्दर आसुरी भाव का विनाश कर दैवी गुणों का आधान हीं उग्र महादेव की उपासना है।


 
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