कामदेव के नाशक होने से वामदेव को कामारी कहा जाता है। काम ने सारे प्राणियों को अपने कर में कर रखा है जिसने उसे उत्पन्न किया उस विधाता को भी कामदेव ने नहीं छोड़ा और उसे भी काम कलुषित बना डाला। अपने माताओं और बहन पर भी अपने विषम बाणों के व्याघात से मदहोश सी स्थिति पैदाकर दी और उसे गर्व हो गया कि मैं विश्वविजेता हूँ। मैं सबको जीत सकता हूँ। दुनियाँ में कोई ऐसा नहीं जो मेरे बाण के सामने नतमस्तक न हो जाये और इसी गर्व का परिणाम था कि वह महादेव को भी वशीभूत करने के लिये महान प्रयत्न करने लगा। परिणाम, देखते ही देखते वह भस्म की ढेडी मात्र बन गया और जगत् निषकाम हो गया, सब सुखी हो गये और भोलेनाथ का नाम पड़ गया कामारी।
जिनकी प्राप्ति में कामना हीं शत्रु है; वे शंकर कामारी कहे जाते हैं। कामदमन मोक्षपथिक के लिए अनिवार्य है। शम, दम, उपरति, तितिक्षा ये चारों काम निरोध के ही नाम है। अविवेक हट जाये तब भी कामनावशात् हम प्रतिषिद्ध से बच नहीं पाते है अत: इसके लिए भगवत्प्रार्थनपूर्वक सयत्नवान् होना चाहिये। पुराणों के अन्दर इस ‘कामदहनलीला’ का बहुत सुन्दर चित्रण है। कल्पलता के अनुसार–
कर्पूरश्वेत! त्वं कामेच्छोर्दूरे निष्कामानामासन्न:।
दर्पं कंदर्पस्य प्रक्षिण्वन् विख्यातोSभूर्लोके कामारि:।।
हे कर्पूरगौर! आप काम्यविषयों को चाहने वालों से दूर रहते हैं और कामनारहित लोगों के लिये अतिविकट है। कामदेव के दर्प को आपने नष्ट किया अतएव इन्ही कारणों से आप संसार में कामारी नाम से प्रसिद्ध हुये।
विचार दृष्टि से शिव ही अविद्या का नाश करके जन्य काम का नाश करते हैं क्योंकि बह्माकार वृत्तियों में स्थित ब्रह्म ही अविद्यानाशक है, न कि वृत्ति। सूर्य कान्त मणि में स्थित सूर्य ही दाहक है न कि मणि।
वस्तुत: प्रत्येक कामभाव अविद्याजन्य होने से अशिव है अशुभ है। शिव भाव समष्टिनिष्ठ होने से वह प्रत्येक व्यष्टिनिष्ठ स्वार्थी अशिव कामभाव को नष्ट करता हैं इसलिए शंकर कामारी कहे जाते हैं। इस काम दहन लीला का नीलकण्ठ ने शिवोत्कर्षमञ्जरी में बड़ा सुन्दर वर्णन किया है–
वक्त्राब्जेषु पितामहस्य जगतां वक्षस्थले श्रीपते:
सर्वाङ्गेषु शतक्रतोरपि दृढानुच्छ्रित्य जैत्रध्वजान्।
संप्राप्तो मदनोSपि यस्य निटिलज्योति: पतङ्गयित:
स स्वामी मम दैवतं तदितरो नाम्नाSपि नाम्नायते।।
भगवद्गीता भी काम को प्रमुख वैरी मानती है और इससे साधकों को सावधान रहने के लिए कहती है– विद्धयेनमिह वैरिणम्। कामनाश के बिना तत्त्वज्ञान का उदय नहीं हो पाता इसलिए इसे प्रमुख अवरोधक माना गया है। कामरहित हीं, शिव निकटता का अनुभव कर पाता है।
दक्षिणामूर्ति वर्णमाला स्तुति में भी शिव के इस लीला का वर्णन आचार्य ने यूँ किया है–
मत्तो मारो यस्य ललाटाक्षिभवाग्नि–स्फूर्जत्कीलप्रोषितभस्मीकृतदेह:।
तद्भस्मासीद्यस्य सुजात: पटवास: तं प्रत्यञ्चं दक्षिणवक्त्रं कलयामि।।
अर्थात् मदोन्मत्त कामदेव, जिसके ललाट में स्थित तृतीय अग्निरूपी नेत्र की धधकती हुई ज्वाला में भस्म हो गया, और वह भस्म, जिनका सुन्दर पटवास अङ्गराग, शरीर में लेपन करने का सुगन्धित पावडर बन गया, उन्हीं प्रत्यक् चैतन्य स्वरूप भगवान् दक्षिणमूर्ति की मैं आराधना करता हूँ। मर्यादित काम का उपभोग करते हुए अमर्यादित काम से बचना हीं कामारी की उपासना है।