आचार्य भास्कर के अनुसार अन्धकारसुरसूदन की व्याख्या इस प्रकार है–
लीलया जगदम्बया पिहितेषु ते नयनेष्यभू–
दन्ध्कारत एव य: स तु भैरवेण निषूदित:।
तादृश: कृपया पुन: शिव गाणपत्यमवापित:
प्रेमवानपि नामत: पुनरन्धकासुरसूदन:।।
अर्थात् जगदम्बिका द्वारा खेल–खेल में आपके नेत्रो को मूँद लिया गया, जिससे बाहर तीनों लोकों में घनघोर अन्धकार छा गया। उस अन्धकार के कारण हीं एक असुर उत्पन्न हुआ, जिसका नाम था अन्धकासुर। वह असुर तो भैरव द्वारा नष्ट कर दिया गया। वैसा नीच होने पर भी, क्षमा माँगने पर करुणा करके, आप ने उसे गणनेता पद पर प्रतिष्ठित कर दिया। अन्धक जैसे असुरों से भी प्रेम करने के कारण आप अन्धकासुरसूदन कहलाते हैं।
भगवान किसी व्यक्ति से रूष्ट नहीं होते हैं वे तो उसकी करनी से नाराज होते हैं यदि वह अपनी करनी बदल देवे और अपनी गलती समझ लेवे तो शिव उसे अपना बना लेते हैं।
अन्धकासुर की कथा शिवपुराण के रुद्रसंहिता के युद्धखण्ड में बड़े विस्तार से दी गयी है। व्यक्ति अपनी सीमा का उलंघन कर के हीं आसुरी भाव वाला बन जाता है और महादेव को विस्मृत कर देता है। हर्षातिसय से प्राप्त दर्प हीं अंधक है।
रहस्यविद्या के अनुसार तो अज्ञानरूप अन्धकार हीं अंधक है जो सबको अंधा करता है वह असुर बनकर स्वयं प्रकाश महादेव सुर का आवरण करता है। भगवान् शंकर हीं गुरु, वेद, महावाक्य बनकर इस अंधकासुर का विनाश करते हैं। अज्ञान के नाश का उपाय करना हीं अंधकासुरसूदन की उपासना है।