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ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

गङ्गाधर

भारतीय संस्कृति की जीवनधारा है गङ्गा। इस गङ्गा को धारण करने के कारण हीं भगवान् शंकर को गङ्गाधर कहा जाता है। वैदिक धर्म का कोई ऐसा वाङ्गमय नहीं है जो गङ्गा की गाथा से रहित हो। गङ्गा अवतरण की कथा बड़े हीं विस्तार से महाभारत, वाल्मिकी रामायण और पुराणों के अंदर पायी जाती हैं।
अतिप्रसिद्ध यह कथा है कि भगीरथ के अथक प्रयास से गङ्गा स्वर्ग से धरती पर उतरने के लिए तैयार हुई लेकिन गङ्गा का वेग इतना तेज था कि उसे कौन धारण करे। यदि गङ्गा सीधे हीं स्वर्ग से धरती पर गिरती तो पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए पाताल में प्रवेश कर जाती और गङ्गा को लाने का जो प्रयोजन था वह व्यर्थ हो जाता। इसलिए कोई ऐसा होना चाहिए था जो भागीरथी के भयंकर वेग को रोककर, प्रवहित करने लायक, लोक कल्याणकारी बना सके। यह सामर्थ्य और किसी देवता में नहीं था इसलिए भगीरथ ने भगवान् शंकर की आराधना की और उन्हें गङ्गाधारण करने के लिए मना लिया। शंकर ने इस कार्य को बड़ी सहजता से किया। जो गङ्गा गर्व के कारण गरजती हुई, गगनमंडल को फाड़ती हुई, गुस्से में, बड़े वेग से आ रही थी कि गौरीपति को भी पाताल में लेकर चली जाऊँगी, उस गङ्गा को जटाधर की जटा में पता भी नहीं चला, कि वह कहाँ गयी। वर्षों तक उस जटारूपी अटवी में भ्रमण करते–करते देवनदी का गर्व खर्व हो गया तब गङ्गाधर ने अपने जटा का केवल एक बाल मात्र हटाया और गङ्गा को गमन के लिए मार्ग दे दिया। भगवान् भोलेनाथ करुणा के कारण हीं गङ्गा को अपने सिर पर धारण करते हैं। गङ्गा सबको पवित्रा करती है। गङ्गा के अंदर यह पावनता की शक्ति शिवसंस्पर्श के कारण हीं आ सकी। भला गङ्गा, शिव को क्या पावन करेगी। शिव तो स्वरुप से हीं परम पावन हैं। श्मशान में रहते हुए भी कभी भी अपिवत्रा नहीं होते। कवियों ने इस प्रसंग का वर्णन अपनी काव्य कलाओं के माध्यम से अपनी कविताओं में खूब किया है। पुष्पार्चनप्रिय पुष्पदन्ताचार्य ने अपने महिम्नस्तोत्र के माध्यम से वामदेव के विचित्र चरित्र का मनोहारी वर्णन किया है–

वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचि: प्रवाहो वारां य: पृषतलघुदृष्ट: शिरसि ते।
जगद् द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमित्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपु:।।।।

गगनगत ताराओं के प्रतिबिम्ब से प्रतिबंबित गङ्गा भी आपकी जटा में एक छोटे से बिंदु की तरह लग रही थी और धरती पर आने पर उसी गङ्गाजल ने सारे संसार को पवित्र करते हुए जलसमुद्र के रूप में इस पृथ्वी को द्वीप के आकार का बना दिया। इससे आपकी दिव्य महिमा का पता चलता है।
आचार्य अप्यय दीक्षित तो गङ्गाधारण में कारण, शिव की कृपालुता हीं मानते हैं। शिव का इसमें रंचमात्र भी अपना कोई स्वार्थ नहीं है। लोक कल्याण के लिए हीं वे इस कठिन कार्य को करते हैं–

गङ्गा धृता न भवता शिव! पावनीति नास्वादितो मधुर इत्यपि कालकूट:।
संरक्षणाय जगतां करुणातिरेकात् कर्मद्वयं कलितमेतदनन्यसाध्यम्।।

अध्यात्मदृष्टि से वेदों के अंदर ज्ञान को हीं गङ्गा कहा है क्योंकि गीता के अनुसार ज्ञान हीं सबको पवित्र करने वाला है। यह ज्ञान भी शिवस्वरूप हीं है। इस ज्ञान को धारणकर प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग का प्रवर्तन करने के कारण शिव को गङ्गाधर कहा जाता है। कर्मवेग की उग्रता को निरूद्ध कर श्रवणादि साधन में लगना भी गङ्गाधर की उपासना है। अशिव कर्मों के त्याग से प्रारंभ कर अंत तो सर्वकर्म संन्यास में ही होना चाहिये। आचार्यभास्कर भी पुराण की कथाओं को हीं मुख्य मानकर गङ्गाधर नाम की व्याख्या करते हैं–

अमरतटिनी निजं बलमवेक्ष्य गर्वाद्भवच्छिरसि गगनादपीपतदतीव वेगोद्धुरा।
पटुतरजटाटवीमुपगता न दृष्टा क्वचित् परशिव! तां दधन्निगदितोSसि गङ्गाधर:।।

भगवान् सबका गर्व हरण कर लेते हैं यह इस गङ्गाधर नाम से भलीभाँति ध्वनित होता है। जिस जटा में गङ्गा जी विराजमान हैं उसका विचित्र वर्णन भगवान् शंकराचार्य अपने शिवकेशादिपादान्त वर्णन स्तोत्र में करते हैं जो भक्तों के लिए मननीय है–

देयासुर्मूर्घ्नि राजत्सरससुरसरित्पारपर्यन्तनिर्य–
त्प्रांशुस्तम्बा: पिशङ्गास्तुलितपरिणतारक्तशालीलता व:।
दुर्वारापत्तिगर्तश्रितनिखिलजनोत्तारणे रज्जुभूता,
घोराधोर्वीरुहालीदहनशिखिशिखा: शर्म शार्वा: कपर्दा:।।

भगवान् शंकर के मस्तक में विराजमान, सरस व सुन्दर जलवाली जो गङ्गा जी हैं, उनके प्रवाह के आर पार तक पहुँची हुई उनकी जटायें हैं, ये जटायें कुछ उपर की ओर बढ़ जाने से, स्तम्ब की तरह मालूम पड़ती हैं, ये जटायें कुछ कुछ लाल व पीले रंग के धान की बाल की तरह है, पुन: ये जटायें कठिन आपत्तियों के गर्त मे पड़े हुए मनुष्यों के उद्धर के लिए रस्सी के समान हैं, और भयंकर पाप रूपी वनपंक्ति को भस्म करने के लिए ये अग्नि की शिखा (लौ) के समान है। इस प्रकार की भगवान् शंकार की पिशङ्ग वर्ण वाली (अर्थात् कुछ कुछ लाल पीली) ये जटाजूट आप लोगों को सर्वदा सुख प्रदान करें।


 
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  कार्यक्रम
 
  शिव कथा
    मकर संक्राति
    शिव नाम प्रवचन
    महा शिव रात्रि
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संर्पक

श्री वेदनाथ महादेव मंदिर
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  प्रवचन
 
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