सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को वश में रखने वाला है काल और काल को वश में रखने वाले हैं महाकाल भगवान् शंकर। इसलिए काल के भी काल होने के कारण उन्हें कालकाल कहा जाता है।
पुराणों के अनुसार तो कालेश्वर अपने भक्तों की रक्षा काल से करते हैं इसलिए वे महाकाल कहलाते हैं। जिस समय मार्कण्डेय की मात्र पाँच साल आयु थी, उस समय यमराज उसे काल कवलित करने के लिए पहुँचे। मुनि माणवक ने महादेव को पुकारा। हे चन्द्रशेखर! आप हीं एकमात्र हमारे रक्षक हैं। उसी समय मृत्युंजय ने यमराज को मृत्यु के मुख में पहुँचाकर मार्कण्डेय को सदा के लिए अमर कर दिया। देवताओं के कहने पर जगत् की व्यवस्था के लिए देवदेव ने यमराज को दुबारा जीवित कर दिया। श्वेत राजा की रक्षा के लिए भी भीम भगवान् ने भीषण काल को भी काल के गाल में पहुँचा दिया। महाकाल की कथा में भी देवप्रिय, प्रियमेधा, सुकृत और सुब्रत की रक्षा के लिए साक्षात् शंकर उनके सामने पधारे। अधिक क्या! श्वेतकेतु, नन्दी, गृहपति के भी मृत्युभयहारक हर हीं हैं। अंत में यमराज को भी हार कर परम शासक के शासन को हीं स्वीकार करना पड़ा और यमदूतों को निर्देश देना पड़ा कि–जो लोग त्रिपुण्ड्र धारण करते हों, शरीर पर भस्म लगाते हों, रूद्राक्ष और जटा धारण करते हों, शिव के जैसा भेष धारण करते हों, उन्हें कभी भी भूलकर यमलोक मत लाना। इसी भाव को आलबाल यूँ व्यक्त करती है–
मार्कण्डेय: कालमुखाद्विमुक्तो दग्धो रूद्र: काल इति प्रसिद्ध:।
तुर्यां मूर्तिं बिभ्रदुमादिनाथ! प्रख्यातोSसि त्वं भुवि कालकाल:।।
कालाग्निरूद्र को भी आप नष्ट कर डालते हैं और स्वयं कालरूपी चौथे मूर्ति को धारण करते हैं इसलिए कालकाल कहलाते हैं। ब्रह्मबोध के द्वारा काल से अतीत अवस्था को प्राप्त करना हीं कालकाल की उपासना हैं।