शम्भु

भगवान शकंर का यह नाम आनंद स्वरूपता को बतलाता है। भोगकाल में वे हीं विषय रूप धारण कर लेते हैं और मोक्ष काल में एकाग्र वृत्ति के विषय बन जाते हैं इसलिए इन्हें शम्भु कहा जाता है। शिव, महेश्वर, शम्भु ये तीनों नाम संहार, स्थिति, सृष्टि को बतलाते हैं। इसके कारण ये तीनों नाम ब्रह्म के तटस्थ लक्षण कहे जा सकते हैं। प्रथम नाम से उपादानता, द्वितीय नाम से निमित्तता एवं तृतीय नाम से अभिन्न निमित्तोपादानता समझनी चाहिए। परमशैव तंत्रचूड़ामणि भास्करराय इस नाम का रहस्य यूं समझाते हैं–

शं भवयसि च भवसे शं च भवसि चेति वा देव।
त्वं देवदारुविपिने लिग्ङे प्रथितोस्यत: शम्भु:।।

अर्थात्–हे देव! आप सुख उत्पन्न करते हैं और स्वयं सुख का भोग करते हैं, आप सुख स्वरूप हैं, आप सदरुप हैं। देवदारु के वन में विराजमान आप का लिंग शम्भु लग कहा जाता है इसलिए आप शम्भु कहलाते हैं।
हमारे अंदर भी जो सुखानुभूति होती है उसमे कारण शम्भु की आनंद रूपता हीं है। हमे सुख प्राप्त होता रहे इसलिए वे सदा अनावृत रहते हैं। शिव के लिए तो उनका स्वरूप सदा अनावृत होने से नित सुखमय है हीं। इसलिए शिव को चिदानंद कहा जाता है। विषयों के अंदर भी आनंद आदि का जो अनुभव होता है, वास्तव में वह आनंद और कहीं से नहीं आकर शिव से हीं आता है क्योंकि आनंद का उत्स उमेश से अतिरिक्त कोई और हो हीं नहीं सकता है। अपने आनंद स्वरूपता की प्राप्ति हीं शम्भु नाम का रहस्य है।

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देवों के देव महादेव हैं अद्वितीय...

भारत के गरिमायुक्त ग्रंथ शिवपुराण में शिव और शक्ति में समानता बताई गई है और कहा गया है कि दोनों को एक-दूसरे की जरूरत रहती है। न तो शिव के बिना शक्ति का अस्तित्व है और न शक्ति के बिना शिव का। शिव पुराण में यह भी दर्ज है कि जो शक्ति संपन्न हैं, उनके स्वरूप में कोई अंतर नहीं मानना चाहिए। भगवती पराशक्ति उमा ने इंद्र-आदि समस्त देवताओं से स्वयं कहा है कि ‘मैं ही परब्रह्म, परम-ज्योति, प्रणव-रूपिणी तथा युगल रूप धारिणी हूं।

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