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ॐ नम: शिवाय      ॐ नम:शिवाय     ॐ नम: शिवाय      ॐ नम:शिवाय     ॐ नम: शिवाय
ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

कृपानिधि

कपाली की कृपा का क्या कहना! वे तो साक्षात् कृपा के सागर हैं इसलिए उन्हें कृपानिधि कहते हैं। आँख मूँद कर, जो भी आता है उसपर अपनी करुणा बरसा देते हैं। भयंकर से भयंकर अपराध को भी क्षमाकर, उसे अपना भक्त बना लेते हैं। कामारी की करुणा के कारण हीं वाराणसी में मोक्ष का सदाब्रत चलता है। पुराणों की कथाओं के माध्यम से भगवान् शंकर की अकारण करुणा का विस्तार से परिचय प्राप्त होता है। शिवपुराण के अंदर हीं आहुकभील, गुरुद्रुह्व्याध, महानन्दावेश्या, सौमिनीचाण्डाली, भस्मासुर, गजासुर, अन्ध्कासुर, इत्यादि भक्तों पर दयालुता की कथा आती है। भगवान् शंकर, श्रीराम जी के प्रति शिव गीता में स्वयं कहते है–

अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:।।
महापापैरपि स्पृष्टो देहान्ते यस्तुमांस्मरेत्।
पञ्चाक्षरीं वोच्चरति स मुक्तो नात्रसंशय:।।

अर्थात् कैसा भी नीच हो एकबार कुपथ छोड़कर भगवद् मार्ग पर सम्यक् प्रकार से समारूढ़ हो जाए वह साधु हीं है। महापापी भी यदि अन्तकाल में मेरा स्मरण करता है अथवा नम: शिवाय इस मन्त्र का जप करता है तो मुक्त हो हीं जाता है इसमें कोई संशय नहीं। कहीं कहीं तो भक्तों ने भगवान् की इस करुणरूपता का सुन्दर वर्णन किया है कि भगवन्! उमा ने तो आपके आधे शरीर पर हीं अधिकार किया है लेकिन करुणा ने तो सम्पूर्ण काया पर हीं अधिकार कर लिया। आलवाल इस कृपानिधिता का वर्णन इस प्रकार करती है–

दैतेयेषु जलन्धरादिषु स्वीयानामपकारकेष्वपि।
सालोक्यादिपदानि दित्ससि त्वं ख्यातोSसि तत: कृपानिधि:।।

जलंधर इत्यादि के द्वारा अपने भक्तों का अपमान होने पर भी आपने उन्हें परम मोक्ष प्रदान किया इसलिए आप कृपानिधि हैं। जनसमुदाय पर कृपा करते हुए साधना करना और अतिकृपा के कारण साधनविमुखता से सावधान रहना कृपानिधि की उपासना है।
साधना काल में साधक के लिए यह संकेत है कि कृपा के सन्दर्भ में वह निधि सा गंभीर रहे। मैत्री आदि सद्गुणों का अभ्यासी होने से दु:खी मात्र पर कृपा की प्रवृति स्वभाविक है। लेकिन यह अत्यधिक नहीं होनी चाहिए जिससे साधना में व्यवधान हीं पैदा हो जाय। इस उग्रता से अपने को रोकना साधक के लिए अत्यन्त आवश्यक है। कृपा करना बहुत अच्छा है पर बहिर्मुखता साधक के लिए बहुत हीं विक्षेपकारी होता है। कृपा का मतलब केवल मनोभाव मात्र नहीं है मनोभाव में आये हुए कर्म को भी संपादित करना होता है। दुखी के दु:ख दूर करने का प्रयास हीं कृपा है। केवल संवेदना या आश्वासन मात्र देना नहीं। साधक को यह भी सावधनी रखनी चाहिए कि यह प्रयास करते हुए आत्मलाभ के उपायों का अनुष्ठान नहीं छुटना चाहिए। अत: जैसे सागर गम्भीर होता हुआ शांत होता है वैसे हीं साधक को कृपा प्रकट करते समय अतिवादी नहीं होना चाहिए।
भगवान् ने इस कृपा के कारण हीं भयंकर जहर को भी अपने कंठ में रख लिया। कृपापरवश होकर हीं शंकर ने भगीरथ के निवेदन को स्वीकार करते हुए गङ्गा को अपनी जटाओं में स्थान दे दिया। इस कृपा का हीं परिणाम है कि चन्द्रमा भगवान् शंकर का मुकुटमणि बन गया इसलिए शंकर कृपानिधि कहलाते है।



 
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