भगवान् जितने कृपानिधि हैं उतने हीं कठोर भी हैं। उनकी इस कठोरता के कारण हीं दैत्यगण भयभीत रहते हैं और उन्हें भीम कहते हैं। प्रलयकाल के समय अत्यन्त भयंकर उग्रमूर्ति धारण करने के कारण हीं भोलेनाथ को भीम कहा जाता है।
वस्तुत: भगवान् में भीषणता, पापियों के पाप के कारण हीं नजर आती है। शिवभक्तों को तो वे शान्ताकार हीं नजर आते हैं। जैसे धर्मियों को कालदेवता धर्मराज के रूप में नजर आते हैं और अधर्मियों को यमराज के रूप में। वे पापी दुष्टों को दर्शन मात्रा से हीं भय देते हैं इसलिए भीम कहे जाते हैं। आसुरी भाव वाले इस भय से भयभीत रहते हैं कि कहीं हमें महाकाल के दर्शन न हो जाए।
उपनिषदों ने तो, भगवान् के भय से हीं पवन, पानी, पृथ्वी सबका शासन बतलाया है। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, निहारिकाएँ भगवान् के भय से हीं अपने मार्ग पर व्यवस्थित रहती हैं। कृपानिधिता का दुरूपयोग न हो पाये इसलिए भगवान् भीम रूप भी धारण करते हैं। भास्करराय तो इस नाम की वैदिक मन्त्रों से समर्थित अर्थ को बतलाते हैं–
भिया वातो वाति ज्वलनदिनकरौ शक्रमृत्युप्रचेतो
मुखा देवास्त्वत्तो भयचकितहृदस्तत्परा: स्वस्वकार्ये।
नभोSधिष्ठात्री ते तनुरतिविपुला सप्तगोदावरे च
प्रतीतस्त्वं लिङ्गे गिरिवरतनयानाथ! तेनासि भीम:।।
हे पर्वतराजपुत्रीपति! आपके भय से हीं वायु, अग्नि, सूर्य, इन्द्र, यम, वरूण आदि देवता अपने–अपने कार्यों में तत्पर रहते हैं। आकाश की अधिष्ठात्री अतिव्यापक भीमरूप वाली मूर्ति धारण करने के कारण आप भीम कहे जाते हैं। भगवान् की परमशासनता का अनुभव करना भीम की उपासना है। सप्तगोदावरी तीर्थ में आप भीमाशंकर नाम से प्रसिद्ध हैं।