संसार वृक्ष का छेदन करने के लिए भगवान् अपने हाथ में परशु धारण करते हैं इसलिए परशुहस्त कहलाते हैं। भगवान् का परशु टूटा हुआ होने पर भी समूल संसृति के बीज को नष्ट कर डालता है।
भगवान् की परशुहस्तता, असंगता के तरफ इशारा करती है। रागी हीं संसार चक्र में फँसता है अपने लोभ के कारण। विरागी इस संसार से वैराग्य के कारण तर जाता है। भगवान् शंकराचार्य भी बार–बार असंगता के ऊपर जोर देते हैं–
गीता भी असंगता को हीं शस्त्र बतलाती है जिसके द्वारा भवविटपी का भेदन किया जा सकता है– असंगशस्त्रेण (गीता 15,3)। उपासना और कर्म चाहे जितना भी उत्तम हो जाये उनसे उत्तम लोको की हीं स्थिति पायी जा सकती है लेकिन आवागमन समाप्त नहीं होता। यह आना जाना तो कैवल्य ज्ञान के द्वारा हीं समाप्त होता है। जब हम शिव की असंगता को पहचान लेते हैं तब हम भी असंग हो जाते हैं क्योंकि हम स्वयं शिव से अभिन्न हैं। हम शिव स्वरूप हीं हैं।
आगम शास्त्र के आचार्य भास्करराय इस नाम का तात्पर्य इस प्रकार समझाते हैं–
अमोघचरितत्त्वं व्यनक्ति परशुस्ते।
शिवागमवचोभिस्तत: परशुहस्त:।।
अर्थात् हे शिव! आपका परशु आपकी अमोघचरितता को व्यक्त करता है ऐसा आगम शास्त्र कहते हैं। अमोघ चरित होने से आप परशुहस्त कहलाते हैं। अमोघ चरित का अर्थ है कि भगवान् की मन,वाणी या शरीर की कोई भी क्रिया कभी भी व्यर्थ नहीं होती क्योंकि वह सत्य संकल्प है। अत्यन्त शुद्धसत्व होनेवाले के कारण शिव की अमोघचरितता स्वभाविक हीं है। अध्यात्म में तो अधिष्ठान ज्ञान के द्वारा द्वैत का छेदन हीं परशुहस्त की उपासना है।