जिस समय दक्षयज्ञध्वंस हो रहा था उस समय यज्ञ देवता; यज्ञ वेदी से भाग रहे थे मृग बनकर। भगवान् शंकर ने उस समय किरात रूप धारण कर उस मृग को पकड़ लिया इसलिए उन्हें मृगपाणी कहा जाता है।
कूर्मपुराण और स्कंधपुराण के अनुसार दारुक बन लीला में जिस समय भगवान् ने विष्णु को पत्नी बना कर देवदारु के बन में प्रवेश किया और नाना प्रकार के हाव–भाव के द्वारा ॠषि पत्नियों को मोहित कर लिया तब ॠषियों को बहुत बुरा लगा और वे भगवान् को भगाने के लिए प्रयत्न करने लग गए। बाघ, साँप, मृग इत्यादि जन्तुओं को उनके तरफ डराने के लिये भेजा। भगवान् ने सबको अपना आभूषण बना लिया। वेदरूपी मृग को वामदेव ने अपने बाएँ कर में हीं पकड़ लिया यह समझाने के लिए कि जिस वेद के द्वारा हम प्रतिपाद्य हैं उस वेद के द्वारा हमारा निराकरण कैसे किया जा सकता है। मुनियों की इस मूर्खता पर महादेव को हँसी आ गई, कि देखो ये नित्य वेद पाठ करते हैं, फिर भी हमे समझ नहीं पाते हैं। श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुदेव के बिना शिव केवल वेद पाठ से समझ में नहीं आता। इसी भाव को भास्करराय अभिव्यक्त करते हैं–
दारुवनस्थैस्त्वयाभिचरद्भि: प्रेषित एणो वेदशरीर:।
याचनमुद्रा वा तव हस्ते तत्प्रथितोSसि त्वं मृगपाणि:।।
भिक्षा पात्रा को धारण करने के कारण भी महेश्वर को मृगपाणी कहा जाता है। विचारक तो चंचल मन को हीं मृग मानते हैं। भक्तों के मनोमृग को अपने वचनरूपी संगीत के द्वारा वश में करने के कारण, मन के अधिपति, शिव को मृगपाणी कहा जाता है। मोहमात्सर्यादि का पतिराग हीं मृगप हैं और उस राग को अणि अर्थात् सूई द्वारा नष्ट करने के कारण ही कामेश्वर मृगपाणी है। मन को अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वशीभूत करना मृगपाणी की उपासना है।