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ॐ नम: शिवाय      ॐ नम:शिवाय     ॐ नम: शिवाय      ॐ नम:शिवाय     ॐ नम: शिवाय
ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

जटाधर:

जटाजूट धारण करने के कारण गङ्गाधर को जटाधर कहा जाता है। तपस्या करते समय तपस्वी क्षौर इत्यादि कर्म नहीं करते जिससे उनके बाल आपस में चिपक जाते हैं। उन सटे हुए अलग समूह का नाम हीं सटा है। जटा वानप्रस्थ का चिह्न है और मुण्डन परमहंसों का। अतएव तपस्वियों के आदि गुरु होने के कारण शिव को जटाधर कहा जाता है। जितने प्रकार के तप हैं, वे सब शिव के द्वारा हीं संदर्शित हैं। देह, मन, बुद्धि के क्रमश: उपवास, व्रत, ध्यान, प्रत्याहार, प्राणायाम, वेदान्तश्रवणमनन आदि तप शिव के द्वारा हीं बतलायें गये है। पुराण पारावारीण आचार्य भास्कर इस नाम की पौराणिक व्याख्या करते हैं–

द्विविधतनुको दक्षध्वंसे बभूविथ य: पुरा
मृगमनुययावेकोSन्यस्तु स्थितो मखमण्डपे।
अखिलसरित: परावारान् पवित्रतरान् धरान्
शिरसि कचतापान्नान् बिभ्रच्छ्रुतोSसि जटाधर:।।

दक्ष विनाश के समय आप दो प्रकार के शरीर वाले हो गयें। एक शरीर से आपने मृग का पीछा किया और दूसरे शरीर से दण्ड देने के लिए जटाधारी हो गये। समुद्र, नदियाँ और पर्वत ये सब आपके केशरूप हीं हैं। इन सबको आप अपने सिर पर धारण करते हैं इसलिए आप जटाधर कहलाते हैं। यज्ञ मण्डप में हीं भगवान् के दो रूप थे एक किरातरूप और दूसरा तापसरूप। इसी आदिकिरात को भगवान् शंकराचार्य ने अपने शिवानंद लहरी में याद किया है।
विचार करने पर कपर्दी और जटाधर एक हीं अर्थ के दो नाम लगते हैं पर प्रथम साधना अवस्था का और दूसरा सिद्ध अवस्था का सूचक है। हर प्रकार के कष्टों को सहते हुए सतत साधना में समाहित रहना हीं जटाधर की उपासना है। मन, वाणी, शरीर को संयत रखकर तप पूर्वक वेदान्त श्रवण हीं, मुमुक्षुओं के लिए जटाधर की पूजा है।



 
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