कैलाशपर्वत पर निवास करने के कारण शिव को कैलाशी कहा जाता है। ऐसे भी शिव पर्वत प्रेमी है। तपस्वियों को वनों और पर्वतों से विशेष लगाव होता है,एकांत स्थल होने के कारण। भारत के उत्तर में स्थित जो हिमालय है, उस हिमालय में हीं एक पर्वत विशेष का नाम कैलाश है। भावुक भक्तों को परम पुनीत और शांत एकांत स्थल होने से शिव–पार्वती का दर्शन वहाँ होते रहता है। उस पर्वत पर निवास होने के कारण गङ्गाधर को कैलाशवासी कहा जाता है। उस कैलाश पर्वत से हीं गङ्गा, सिन्धु, ब्रह्मपुत्र आदि नद–नदियाँ प्रवहित होती हैं। कैलाश का अर्थ है– जो स्फटिकमणि की तरह धवल हो और जिसकी छाया जल में पड़ती हो। अथवा केलि (विलास) समूह को हीं कैलाश कहा जाता है। शिव सदा विलास मग्न होकर के आनंद में पड़े रहते हैं इसलिए कैलाशवासी कहे जाते हैं।
सिद्धांतसारोपनिषद् तो परम कैवल्य को हीं कैलाश बतलाता है–
परमकैवल्य: स एव कैलास:। अर्थात् ब्रह्मरूप आनंद में बने रहना हीं शिव का कैलाशवास है। आचार्य भास्कर इस कैलाशवासी का अर्थ यूँ समझाते हैं–
हरेर्मूर्घ्नि मेरौ हिमे मन्दराद्रौ भवेत्केलिभूमौ भवत्कर्मगम्या:।
तदूर्ध्वं परा ज्ञानलभ्यास्ति तासु स्थितत्त्वेन जातोSसि कैलासवासी।।
अर्थात् वैकुण्ठ से ऊर्ध्व, मेरूगिरि पर, हिमगिरि पर और मन्दरगिरि पर, जो आपकी कर्म से प्राप्त होनेवाली क्रीड़ाभूमियाँ हैं, उन भूमियों में स्थित होने के कारण और उन सबसे परे, जो ज्ञान से प्राप्त क्रीड़ाभूमि है उसमें स्थित होने के कारण आप कैलाशवासी हैं। रहस्य विद्या के अनुसार सहास्त्रारचक्र में हीं कैलाश पर्वत है और वहीं पर शिव का निवास है। उस शिव का साक्षात्कार हीं कैलाशवासी की उपासना है। यह कैलाश वैकुण्ठादि लोकों से भी ऊपर है।