शिव जितने मृदुल हैं उतने हीं कठोर हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का भार भी शिव को डिगा नहीं सकता इसलिए उनको कठोर कहा जाता है। दुष्टों के दमन के समय और महाप्रलय के काल में इस कठोरता की आवश्यकता पड़ती है। शिव कितने कठोर हैं यह तो शिव पुराण के प्रसंग से हीं पता चलता है। जिसके लिए पर्वतराज पत्री ने पुनीत तप किया, उस पार्वती को भी क्षणभर में त्याग कर उस पर्वत से एकांत में चले गए। पार्वती रोती रही, पर उन्होने मुड़कर नहीं देखा। कठोर होने के कारण हीं शिव भक्तों की मोह ममता का संहार करते समय भी नहीं सकुचाते हैं, क्योंकि इस संहरण के बिना स्वरूप की प्राप्ति सहजतया नहीं हो सकती है।
शिव की कठोरता साधक को दृढ़ भाव के तरफ इंगित करता है। कभी–कभी साधना में हठयोग का भी सहारा लेना पड़ता है। अड़िग निश्चय में कठोर होना कोई दुर्गुण नही है। षड् संपत्तियों में शम, दम की आवश्यकता इसीलिए पड़ती है। ऐसे कठोर का अर्थ कहीं–कहीं क्रूर भी होता है। शिव अज्ञान को संमर्दित करते समय अत्यन्त क्रूर हो उठते हैं। नटराजमूर्ति में चरणों के नीचे दबा हुआ अपस्मार, शिव की इस कठोरता का वर्णन करता है। भास्करराय इस कठोर शब्द की बड़ी मृदुल व्याख्या करते हैं–
घोरैका ते तनुरन्या शिवेति द्वे ते बिभ्रज्जगतां रक्षकोSसि।
दुष्टा जीवा दमनेनैव रक्ष्या: पूर्णत्वाद्वा कथितस्त्वं कठोर:।।
अर्थात् घोर और अघोर रूप से आपकी दो मूर्तियाँ हैं उन दोनों को धारण करते हुए आप जगत् की रक्षा करते हैं। नियंत्रण से हीं दुष्ट जीव रक्षणीय है। परिपूर्ण होने से अथवा घोर होने से आप कठोर कहे जाते हैं। ममता कितनी भी मोहनीय क्यों न हो उसे काट फेंकना हीं शिव के कठोर रूप की उपासना है।