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ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

त्रिपुरान्तक

महाभारत के कर्णपर्व में त्रिपुरासुर की वध की कथा बड़े विस्तार से आयी है। त्रिपुरासुर को नष्ट करने के कारण महादेव को त्रिपुरांतक कहा जाता है।
जिस समय तारकासुर का वध भगवान् षड़ानन ने किया, उसी समय उसके बेटों ने देवताओं से बदला लेने का प्रण कर लिया। तीनों पुत्र तपस्या करने के लिए घोर जंगल में प्रवेश कर गए, और हजारों साल तक अत्यन्त दुष्कर तप करके ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया। जैसा कि असुरों का स्वभाव है, वे सदा हीं मृत्यु पर अपना विजय चाहते हैं। उन्होने भी ब्रह्माजी से अमरता का वरदान माँगा। पितामह ने उन्हें मना कर दिया, और कहने लगे कि कोई ऐसी शर्त रख लो जो अत्यन्त कठिन हो। उस शर्त के पूरा होने पर हीं तुम्हारी मृत्यु होवे। तीनों ने खूब विचार कर, ब्रह्माजी से वरदान माँगा–हे स्वयंभू! आप हमारे लिए तीन पुरियों का निर्माण कर देवें और वे तीनों पुरियाँ जब अभिजित् नक्षत्र
में एक पँक्ति में खड़ी होंवे, और कोई क्रोधजित् अत्यन्त शांत अवस्था में असंभव रथ और असंभव बाण का सहारा लेकर हमें मारना चाहे, तब हमारी मृत्यु होवे। ब्रह्माजी ने कहा–एवमस्तु!
शर्त के अनुसार उन्हें तीन पुरियाँ प्रदान की गई। तारकाक्ष के लिए स्वर्णपुरी, कमलाक्ष के लिए रजतपुरी और विद्युन्माली के लिए लौहपुरी का निर्माण विश्वकर्मा ने कर दिया। ये तीनों भाई इन तीनों पुरियों में रहते हुए, अपने आतंक से सातों लोको को आतंकित कर दिया। वे जहाँ भी जाते समस्त सत्पुरुषों को सताते रहते। यहाँ तक की उन्होने देवताओं को भी, उनके लोकों से बेदखल कर दिया। अमरगण इधर– उधर छुपकर, मर–मर कर जैसे–तैसे जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनलोगों ने मिलकर के अपना सारा बल लगाया लेकिन त्रिपुरासुर का प्रतीकार नहीं कर पाये। हारकर अंत में हर कि शरण में जाना पड़ा। हर के चरणों में नतमस्तक होकर देवता रोने लगे। भगवान् शंकर ने पूछा–अरे! क्या हो गया? देवताओं ने अपनी दुर्दशा का बखान कर दिया। महादेव कहने लगे, सब मिलकर के प्रयास क्यों नहीं करते! देवताओं ने कहा–हम सब इकट्ठे प्रयास करके देख चुके हैं कि हमसे कुछ नहीं हो पाया। तब शिव ने कहा–मैं अपना आधा बल तुम्हें देता हूँ और तुम फिर प्रयास करके देखो। लेकिन सम्पूर्ण देवता सदाशिव के आधे बल को सम्हालने में असमर्थ रहे। तब परमेश्वर ने स्वयं त्रिपुरासुर का संहार करने का संकल्प लिया। साथ हीं सब देवताओं ने अपना–अपना आधा बल महादेव को समर्पित किया। अब उनके लिए रथ और धनुष बाण की तैयारी होने लगी जिससे रणस्थल पर पहुँच कर राक्षसों का विदारण कर सकें। इस रथ का पुराणों में बड़े विस्तार से वर्णन मिलता है। पृथ्वी को हीं भगवान् ने रथ बनाया, सूर्य और चन्द्रमा पहिए बन गए, स्त्रष्टा सारथी बने, विष्णु भगवान् बाण, मेरुपर्वत धनुष और वासुकी बना उस धनुष की डोर। इस प्रकार संहार की सारी लीला रची गई। जिस समय भगवान् उस रथ पर सवार हुए, तब सकल देवताओं के द्वारा सम्हाला हुआ वह रथ भी डगमगाने लगा। तभी विष्णु भगवान् वृषभ बन कर उस रथ के जुए में जा जुड़े। उन घोड़ो और वृषभ के पीठ पर सवार होकर महादेव ने उस दानव नगर को देखा और पाशुपत अस्त्र का संधान कर, तीनों पुरों को एकत्र होने का संकल्प करने लगे। उस अमोघ बाण में विष्णु, वायु, अग्नि और यम चारों हीं समाहित थे। अभीजित् नक्षत्र में, उन तीनों पुरियों के एकत्रित होते हीं महादेव ने हँसते–हँसते, अपने बाण से जलाकर खाक कर दिया और तब से शंकर त्रिपुरांतक हो गये। वस्तुत: भगवान् के लिए कुछ भी असंभव नहीं है, फिर भी लीला के लिए इतना आडंबर करना पड़ा कि सब लोग यह समझें कि हमारे सहयोग से हीं त्रिपुरासुर मारा गया। इसका बड़ा सुन्दर बर्णन सौरपुराण के अंदर किया गया है–

रथेन क चेषुवरेण तस्य गणैश्च शम्भोस्त्रिपुरं दिधक्षत:।
पुरत्रयं दग्धुमलुप्तशक्ते: किमेतदित्याहुरजेन्द्र्मुख्या:।।
मन्ये च नूनं भगवान् पिनाकी लीलार्थमेतत् सकलं प्रहतु‍र्म्।
व्यवस्थितश्चेति तथाSन्यथा चेदाडम्बरेणास्य फलं किमेतत्।।

आचार्य भास्कर त्रिपुरासुर नाम की व्याख्या इस प्रकार करते हैं–

स्थूलं लिङ्गं करणमिति यत् त्रयं वपुषां नृणां भक्तानां चेत्तदखिलमपि त्वमन्तयसि क्षणात्।
यद्वा नाथ! त्रिपुरदहनादलौकिकचर्यया श्रीशैलेSसि प्रथिततनुमानिति त्रिपुरान्तक:।।

अर्थात् हे स्वामी! आपके जो भक्त होते हैं उनका देहाध्यास आप स्वयं समाप्त कर देते हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण ये जो तीनों शरीर हैं, ये आप से विमुख जनों को हीं आवागमन में डालते रहते हैं। आप तीनों देहों का बाध करने के कारण त्रिपुरांतक कहलाते हैं। अथवा त्रिपुरासुर का दहन करने के कारण और श्रीशैल पर्वत में त्रिपुरारी लिङ्ग से प्रकट होने के कारण त्रिपुरांतक कहे जाते हैं। आंध्रप्रदेश के कृष्णा नदी के तट पर मल्लिकाजु‍र्न के पास हीं त्रिपुरांतक लिङ्ग स्थित है। वहाँ पर और भी अड़सठ शिव क्षेत्र बतलाये गये हैं।
अध्यात्म में तो, तीनों देहों को हीं तीन पुरियां बतलाया गया है। इन अज्ञान जनित देहों का नाश करने के कारण शंकर को त्रिपुरदैत्य संहारक कहा जाता है। कहीं–कहीं नाम रूप कर्म को हीं त्रिपुर के रूप से समझाया गया है। इनका बाध भी परमेश्वर महेश्वर हीं करते हैं इसलिए वे त्रिपुरांतक हैं। भगवान् शंकराचार्य ने त्रिपुरासुर संहार की लीला अपने दशश्लोकी में बड़े हीं सुन्दर शब्दों में उटंकित किया है–

क्षोणी यस्य रथो रथाङ्गयुगलं चन्द्रार्कबिम्बद्वयं
कोदण्ड: कानकाचलो हरिरभूद्वाणो विधि: सारथि:।
तूणीरो जलधि र्हया: श्रुतिचयो मौर्वी भुजङ्गधिप:
तस्मिन् मे हृदयं सुखेन रमतां साम्बे परब्रह्माणि।।

त्रिपुरासुर के विजय के अवसर पर जिस भगवान् शंकर ने पृथ्वी को अपना रथ बनाया, सूर्य और चन्द्रमा के बिंबों को रथ के पहिए बनाए, सुमेरु पहाड़ को धनुष बनाया और भगवान् विष्णु को बाण बना दिया, ब्रह्मा जिनके रथ को चलाने वाले सारथि बना, समुद्र जिनका तूणीर बना, वेद वाहन घोड़े बने, सर्पराज बासुकि को जिन्होने मौर्वी बनाया अर्थात धनुष की डोरी बनाया उन्हीं परमब्रह्म रूप साम्ब सदा–शिव में मेरा हृदय नित्य हीं सुख पूर्वक रमता रहे।
भगवान् कितने साहसी हैं यह कौन बता सकता है। आचार्य शंकर भगवान् के स्वरूप का वर्णन अपने शिवानन्दलहरी स्तोत्र में करते हैं–

किं ब्रूमस्तव साहसं पशुपते कस्यास्ति शम्भो भवद्,
धैर्यं चेद्दृशमात्मन: स्थितिरियं चान्यै: कथं लभ्यते।
भ्रश्यद्देवगणं त्रसन्मुनिगणं नश्यत्प्रपञ्चं लयं,
पश्यन् निर्भय एक एव विहरत्यानन्दसाने भवान्।।

अर्थात् हे पशुपते! आपके साहस के विषय में हम क्या कहें? हे शम्भो! आपके समान धैर्यशाली अन्य कौन देवता है। अन्य देवताओं के द्वारा इस प्रकार की आत्मा की निश्च लात्मक स्थिति कैसे प्राप्त हो सकती है? क्योंकि प्रलय काल में जिस समय देवताओं का धैर्य डिग जाता है और मुनिगण भी त्रस्त हो जाते हैं, यह सारा प्रपञ्च जब नष्ट–भ्रष्ट हो जाता है, ऐसे महा भयंकर प्रलय काल को भी, निर्भयतापूर्वक अकेले देखते हुए, आप आनन्दघनरूप में स्थित होकर विहरण करते हैं।
तीनों देहों से हटकर अपने देहातीत स्वरूप को सम्झाना हीं त्रिपुरांतक की उपासना है।


 
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  कार्यक्रम
 
  शिव कथा
    मकर संक्राति
    शिव नाम प्रवचन
    महा शिव रात्रि
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संर्पक

श्री वेदनाथ महादेव मंदिर
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