पिनाकी

भक्तवत्सल भगवान सम्पूर्ण जीवों की रक्षा के लिए अपने हाथ में धनुष धारण करते हैं। उस धनुष का नाम है पिनाक। पिनाक को धारण करने के कारण शिव को पिनाकी कहा जाता है।
इस पिनाक की भी बड़ी विचित्र कथा है। एक समय, घोर कानन के अंदर, कण्व मुनि कठोर तपस्या कर रहे थे। तपस्या करते–करते, समाधिस्थ होने के कारण उन्हें भान हीं नहीं रहा कि सारा शरीर दीमक के द्वारा बाँबी बना दिया गया। उस मिट्टी के ढे़र पर हीं एक सुन्दर बाँस उग आया। तपस्या जब पूर्ण हुई तब ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उन्होने अपने अमोघ जल के द्वारा कण्व की काया को कुन्दन बना दिया। उन्हें अनेक वरदान दिये और जब जाने लगे तो ध्यान आया कि कण्व की मूर्धा पर उगी हुई बाँस कोई सामान्य नहीं हो सकती। इसका सदुपयोग करना चाहिए। उसे काट कर ब्रह्मा जी ने विश्वकर्मा को दे दिया और विश्वकर्मा ने उससे तीन धनुष बनाया–पिनाक, शागर्ङ, गाण्डीव। और इन तीनों धनुषों को ब्रह्मा जी ने भगवान शंकर को समर्पित कर दिया। भगवान शंकर ने हीं विष्णु की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें शागर्ङ धनुष दे दिया। कृष्ण से प्रेरित अजु‍र्न की तपस्या से मुदित हो महेश्वर ने गाण्डीव दे दिया और पिनाक अपने पास हीं रख लिया। पिनाक को पिनाक इसीलिए कहते हैं कि इसके बाणों ने नाक यानी स्वर्ग को भी पिहित यानी ढ़क दिया। यह पिनाक सर्पाकार और सात फनों वाला है। जिसे जगत् के हित के लिए शंकर अपने कर में सुशेभित करते हैं। भास्कर राय भी इसी अर्थ का समर्थन करते हैं–

नाकोSपि येन पिहितो मुनिकण्वमूर्धवल्मीकवेणुजधनुस्त्रितयाग्रजन्मा।
य: सप्तशीर्षफणिरूप उदारकर्मा चापस्तमावहसि नाथ! तत: पिनाकी।।

अध्यात्म में तो प्रणव ही धनुष है जिससे पिनाकी पकड़ में आ जाते हैं।

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देवों के देव महादेव हैं अद्वितीय...

भारत के गरिमायुक्त ग्रंथ शिवपुराण में शिव और शक्ति में समानता बताई गई है और कहा गया है कि दोनों को एक-दूसरे की जरूरत रहती है। न तो शिव के बिना शक्ति का अस्तित्व है और न शक्ति के बिना शिव का। शिव पुराण में यह भी दर्ज है कि जो शक्ति संपन्न हैं, उनके स्वरूप में कोई अंतर नहीं मानना चाहिए। भगवती पराशक्ति उमा ने इंद्र-आदि समस्त देवताओं से स्वयं कहा है कि ‘मैं ही परब्रह्म, परम-ज्योति, प्रणव-रूपिणी तथा युगल रूप धारिणी हूं।

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