कमनीय काया पर सुन्दर भस्म लेपित होने के कारण भगवान् को भस्मोद्धूलितविग्रह कहा जाता है। शिव भस्म धारण करके यह संकेत देते हैं कि इस देह का दहन निश्चित है, इसलिए गहन चिंतन करके, इसके अभिमान का परित्याग कर देना चाहिए। जैसा कि ईशावास्य उपनिषद् कहती है–भस्मांतंशरीरम्। भगवान् शंकर भस्म धारण के द्वारा सती से अपने अनन्य प्रेम को भी प्रदर्शित करते हैं। जिस समय दक्षयज्ञ में सती का शरीर भस्म हो गया था, उस समय उस भस्म को सुरक्षित रख लिया और जब–जब सती याद आती थी, तब–तब वह भस्म लेकर अपने गात्र पर मल लेते। अन्य कथाओं के अनुसार भगवान् शकर, कामदेव को जलाने के बाद, उसकी भस्म अपने वपु पर धारण करते हैं इसलिए भस्मधर कहलाते हैं। ऐसे तो शिव चिता का भस्म धारण करते हैं। जिसका वर्णन पुराण–साहित्य में प्रचुर मात्रा में मिलता है। अर्धनारीश्वर स्तोत्र भगवान् के स्वरूप को नमन करता है–चितारज: पुञ्जविचर्चिताय। इस नाम की भास्करीय व्याख्या इस प्रकार है–
स्वोङ्गे भस्म विलिम्पन् नाथ! ज्ञानां शिरोव्रतमुपदिशसि।
भूतेशाभिधतीर्थेSपि त्त्वं भस्मोद्धूलितविग्रहनामा।।
अर्थात् हे नाथ! आप अपने भक्तों के लिए भस्म रमाकर शिव तत्त्व का ज्ञान चाहने वालों के लिए शिरोव्रत का उपदेश करते हैं। भूतेश नामक तीर्थ में प्रतिष्ठित हैं, इसलिए भस्मोद्धूलित नाम से कहे जाते हैं। रहस्य विद्या के अनुसार तो सम्पूर्ण प्रपंच को बाधित करने वाली वृत्ति से, अविद्या के जल जाने पर भी जो बाधितानुवृतिरूप अविद्यालेश बच जाता है, उसके सहारे हीं आप साधकों को दर्शन देकर असाधकों से अपने को आवृत कर लेते हैं इसलिए भस्मोद्धूलितविग्रह कहलाते हैं। शिवभक्त नित्य हीं भस्म धारण करे, कभी भी भाल भस्मरहित न हो यही भस्मोद्धूलितविग्रह की उपासना है। भस्मधारण के मन्त्रों में पञ्चभूतों को हीं महाभस्म स्वीकार किया गया है।