ईश्वर का ईश्वर कोई हो नहीं सकता अतएव शंकर को अनीश्वर कहा जाता है। वे सबके ईश्वर हैं, पर उनका कोई शासन करनेवाला नहीं है। उनसे कोई बड़ा हो तभी तो उनका शासन करे। ब्रह्मा, विष्णु तो उनका ज्योर्तिलिङ्ग हीं सम्पूर्णरूप से नहीं देख पाए। तब वे शंकर से बड़े, कहाँ हो सकते हैं। वे तो शंकर के शिष्य हैं। जब ब्रह्मा, विष्णु शिष्य हैं तो उनका शासन कौन करे। इसलिए इसी भाव को गोस्वामी जी ने यूँ प्रकट किया है–परम स्वतन्त्र न सिर पर कोई। जब सृजक और पालक का ये हाल है, तो इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि देवताओं की बात हीं क्या है। महेश्वर होने के कारण भी शिव को अनीश्वर कहा जाता है। जिस समय सृष्टि का संहार होता है उस समय अंत में शिव हीं शेष बचते हैं और अगला कल्प उनसे हीं प्रारंभ होता है। उस समय सब कुछ शिवाधीन होता है, इसलिए शिव अनीश्वर कहे जाते हैं।
अध्यात्म में तो अधिष्ठान के अधीन हीं अध्यस्थ होता है। स्वयं अधिष्ठान किसी के अधीन नहीं होता इसलिए उसे अनीश्वर कहा जाता है। श्रुतियाँ भी एक स्वर से उसकी ईश्वरता की स्तुति करती है–न तस्य कश्चित् पतिरस्तिलोके न चेशिता (श्वेता.6 .9)।
आचार्य भास्कर के अनुसार तो अनीश्वरता की व्याख्या इस प्रकार है–
ईश्वरत्त्वावधिर्य: स सर्वेश्वर:। तस्य नेश: पर: त्वं ततोSनीश्वर:।।
हे भगवन्! ईश्वरता की जो सीमा है, वह आप सर्वेश्वर ही हैं। उन आपका कोई अन्य नियन्ता है नहीं। अत: आप अनीश्वर है। कर्मों का नियामक ईश्वर को माना जाता है, क्योंकि कर्मों के अनुसार फल ईश्वर देता है। शिव उस कर्मफल को भी नहीं स्वीकारते हैं इसलिये अनीश्वर कहलाते हैं। अनीश्वर शब्द का एक अर्थ ईश्वर भिन्न भी है। शिव शासन करते भी हैं और नहीं भी करते हैं इसलिए अनीश्वर कहे जाते हैं। शिव की परमेश्वरता का अनुभव हीं अनीश्वर की उपासना है।