सब कुछ जानने के कारण शर्व को सर्वज्ञ कहा जाता है। माया के द्वारा स्वोपाधिक होकर सारे जीवों के साक्षी होने के कारण शिव को सर्वज्ञ कहते हैं।
श्रुतियाँ भगवान् की सर्वज्ञता का बड़े विस्तार से बखान करती है– एष सर्वज्ञ:, य: सर्वज्ञ सर्ववित्। वायुपुराण भी सर्वज्ञता को शिव का अंग बतलाता है–सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः।
जो शंकर, सबसे पहले ब्रह्मा को भी वेद का पाठ पढ़ाते हैं वे सर्वज्ञ होंगे तभी यह संभव है। क्योंकि प्रलयकाल में कुछ भी नहीं रहने पर, वेदों का भी कारण भूत एक मात्रा शिव हीं अवशेष रहते हैं। वही ब्रह्मा के द्वारा वैदिक परंपरा को प्रारंभ करते हैं। जैसा कि श्रुति कहती है–यो वै वेदांश्च प्रहिणोतितस्मै (श्वे6.18)।
ईश्वर की ईश्वरता तभी संभव है, जब वह सर्वज्ञ होगा। भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालों को वर्तमानवत् देखता है। उसके लिए न कोई भूत है और न कोई भविष्य। क्योंकि वह पुराण है–पुरापि नवम् अद्यापि नवम्।
ईश्वर की सर्वज्ञता, सर्वरूप होने से हीं संभव है। सर्वरूप होने के कारण हीं उससे कुछ भी अज्ञात नहीं है, इसलिए क्योंकि वह उपादान रूप से वस्तु में ही विराजमान है। जो सबकुछ हो कर के जानता है उसे हीं सर्वज्ञ कहते हैं। शिव के सिवाय और कोई सर्वज्ञ हो भी नहीं सकता। सबकी अवधि निश्चित है पर शिव तो निरवधिक है। शिव में ही सबका समाधान हो जाता है। शिव के स्वयं ज्ञानरूप होने के कारण वे सबको जानते हैं। आचार्य के अनुसार सर्वज्ञता की ये परिभाषा है – षट्त्रिंशत्तत्त्वी त्वय्येवाध्यस्ता! सर्वाधिष्ठानं तत्त्वं सर्वज्ञ:।। सबके अधिष्ठान होने के कारण छत्तीसों तत्व आप में हीं अध्यस्त हैं। अपने में अध्यस्तों के जानकार होने के कारण,औरजोकुछहैवहआपमेंहीअध्यस्तहोनेसेआपसर्वज्ञकहेजातेहैं।