सबका अपना आपा होने के कारण परमशिव को परमात्मा कहा जाता हैै। संसारियों को देह, मन, घर, स्त्री, पुत्रादि आत्मा के समान हीं लगते हैं। जिस पर अतिशय प्रेम प्रकट किया जाय, उसे हीं आत्मा कहा जाता है–अपना कहा जाता है।
पंचदशी के अनुसार गौणात्मा व मिथ्यात्मा से परमात्मा को अलग करने के लिए परम विशेषण दिया गया है। ऐसे तो आत्मा परम है हीं, फिर भी उसकी ‘परम’ सत्ता के प्राकट्य के लिए परम शब्द का प्रयोग किया जाता है। शिव हीं मुख्यात्मा है इस बाता को बताने के लिए उन्हें परमात्मा शब्द से कहा जाता है।
लिङ्गपुराण के अनुसार आत्मा का लक्षण यह है–
यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह।
यच्चास्य सन्ततो भाव: तस्मादात्मेति कीर्त्यते।।
कल्पलता के अनुसार तो परमात्मा शब्द की यह पुनीत व्याख्या है–
अन्तर्यमयंस्त्वं भूतान्यखिलानि।
भूय: कथितोSसि श्रुत्या परमात्मा।।
अर्थात् सभी प्राणियों को अंदर से शासित करने के कारण वेद द्वारा, आप अनेक स्थलों पर परमात्मा नाम से कहे जाते हैं। भगवान् शंकर का यह परमात्मा नाम महानारायणोपनिषद् में प्रसिद्ध है–तस्या: शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थित:। भगवान् का शासन भी दो तरह से होता है। बाहर का शासन तो राजा के शासन की तरह दण्डादि भय से और अंदर का शासन शासित होने वाले से अभिन्न होकर। जिस प्रकार सोमदत्त अपने हीं प्रतिबिंब का शासन खुद कर लेता है, उसका आत्मा होकर। ऐसे हीं प्रतिबिंबस्थानीय जीव का आत्मा होकर ईश्वर शासन करता है। ईश्वर की अंतर्यामिता का वर्णन बृहदारण्यकोपनिषद् बड़े विस्तार से करती है। जीवात्मा अपने को परमात्मा का स्वरुप हीं समझे, यही परमात्मा शिव की उपासना ह