भगवान् शंकर चन्द्रमा, सूर्य और अग्निरूप आँख वाले हैं इसलिए उन्हें सोमसूर्याग्निलोचन कहा जाता है। पुराणों में यह प्रसिद्ध है कि भगवान् शंकर त्रिनेत्र हैं। उन त्रिनेत्रता का हीं विस्तृत व्याख्यान है सोमसूर्याग्निलोचन। मुण्डकोपनिषद् स्वयं इन नेत्रों का वर्णन करती है–चक्षुषीचन्द्र्सूर्यौं। (2,1,4) सूर्यादि के रूप में देखकर महादेव हमारे कर्म साक्षी हीं बनते हैं और तभी तो वह हमारे कर्म का निर्धारण कर पाते हैं।
सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करने वाले ये तीन हीं नेत्र हैं और इन तीनों के अंदर प्रकाश, भगवान् परमशिव का है। अथवा तीनों हीं भगवान् की मूर्तियाँ है इसलिए वे सोमसूर्याग्निलोचन हैं।
लोचन उसे कहते हैं जिसके द्वारा देखा जाता है सोम, सूर्य और अग्नि रूप से वे सबके लोचन है इसलिए सोमसूर्याग्निलोचन हैं। अज्ञानरूप अंधकार, आधिभौतिक आधिदैविक आध्यात्मिक संताप और विपत्तिरूपहिमपात से बचाने के लिए जगद्धर भट्ट, शिव की इस रूप में स्तुति करते हैं–
घोरान्धकारविधुरं विविधोपतापतप्तं विप्द्गुरुतुषारपराहतं माम्।
त्वं चेज्जहासि वद कस्तपनेन्दुवह्निनेत्रो हरिष्यति परस्त्रिविधां ममार्तिम्।।
हे त्रिलोचन! यदि आप इन तीन रूपों से हमारी इस पीड़ा को नहीं हरेंगे तो फिर कौन हमारे दु:खों का निवारक होगा। आचार्य भास्कर तो इस नाम की व्याख्या इस प्रकार करते हैं–
भास्वदादयो लोचनानि ते मानसातिगं त्वां विदन्ति नो।
भान्तमन्वमी भान्ति साम्प्रतं तेन सोमसूर्याग्निलोचन:।।
अर्थात् आपके सूर्यादिलोचन मनवाणी से अतीत आपको विषय नहीं कर पाते हैं और आप स्वत: प्रकाशमान होने के कारण सूर्यादि को हीं प्रकाशित करते हैं इसलिए सोमसूर्याग्निलोचन हैं। भगवान् इन तीन नेत्रों से हमें सतत निहार रहें है, यह अनुभव करना हीं इस नाम की उपासना है।