हवन द्रव्य के रूप में प्रकट होने के कारण शंकर को हविरूप भी कहा जाता है। जिसका यज्ञ कुण्ड में होम किया जाता है, उसे हवि कहते हैं। हम जो भी शिवार्पण करते हैं या किसी उद्देश्य से किसी को देते हैं, वह वस्तु शिव से अलग नहीं है, ऐसा समझ कर व्यवहार करना शिव की हविरूपता है। भोजन इत्यादि करते समय भी भोग्य वस्तुओं के अन्दर शिवदृष्टि रखकर, उसे हवि हीं समझना चाहिए। भोग करने वाला शिव हीं है। जिसमें भोग पड़ रहा है वह यज्ञकुण्ड भी शिव हीं है। गीता के अनुसार सबको ब्रह्मरूप हीं समझना चाहिए। इसी आशय से विद्वानों ने भोगसामग्री को भी हवि हीं बतलाया है। मैत्रायणी उपनिषद् भी इसी बात का समर्थन करती है–
होता भोक्ता हवि र्मन्त्रो यज्ञो विष्णु: प्रजापति:।
सर्व: कश्चिद् प्रभु: साक्षी योSमुष्मिन् भाति मण्डले।।
परमशिवेन्द्र सरस्वती ने शिवसहस्त्र नाम के अंदर सबको आनन्द देने के कारण परमशिव को हवि रूप बतलाया है– सर्वानन्दकरत्वात् हवि: परमशिव:। आचार्य भास्कर तो वेदान्त दृष्टि से इस नाम की व्याख्या यूँ करते हैं–
दुग्धमात्रस्य कुहरे यथा घृतं प्राणिमात्रस्य दहरे तथा भवान्।
चेतसा संमथित एव लभ्यते हूयमानं त्वमखिलं ततो हवि:।।
अर्थात् जैसे दूध के अंदर घी छुपा रहता है और मन्थन करने पर प्रकट हो जाता है, वैसे हीं आप प्राणियों के हृदय में छुपे रहते हैं और विचार करने पर प्रकट हो जाते हैं। घी के समान होने के कारण आप हवि रूप कहे जाते हैं। वेदान्त दृष्टि से तो इन्द्रियों में प्रतिपल पञ्च विषयों की आहूति पड़ती रहती है। वे विषय भी, विचार दृष्टि से शिव रूप हीं है। अपने अंत:करण के विकारों को, विचार की अग्नि में जला डालना शिव की हविरूप की उपासना है।