|
|
|
|
ॐ नम: शिवाय |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
|
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी |
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
| |
शिव के 108 नाम |
 |
|
|
| शशिशेखर |
नीच को महत्वपूर्ण बना देना यह शंकर का स्वभाव है। चन्द्रमा के कलंकी होते हुए भी शिव ने इसे अपने शीश पर रखकर मुकुट बना लिया। चन्द्रमा को सिर पर धारण करने के कारण ही शंकर शशिशेखर कहे जाते हैं। शश कहते हैं खरगोश को। शश के जैसा चिन्ह होने के कारण हीं चन्द्र को शशी कहते हैं। शेखर का अर्थ होता है शिरोभूषण यानि शशी जिसका शिरोभूषण है उसे कहते हैं शशिशेखर।
जिस समय दक्षयज्ञविध्वंस हो रहा था उस समय चन्द्रमा भी वहीं था। कोई गलती न होते हुए भी चन्द्रमा दंडित हो गया। निरपराध दंडित न हो उसे संतुष्ट करने के लिए शंकर ने शिरोभूषण बना लिया। चन्द्रमा ने भी भगवान शंकर की सामगान के द्वारा बड़ी सुन्दर स्तुति की। शशिशेखर के सम्बन्ध में भास्करराय की यह सम्मति है–
मतिमयोSखिलजीवसमष्टिरप्यमथि दक्षमखे हिमगुवृर्था।
इति धिया दयया विधृतस्त्वया शिरसि तेन भवान् शशिशेखर:।।
अर्थात् ज्ञानरूप सब जीवों का समष्टि आत्मक होता हुआ यह चन्द्रमा मेरे द्वारा व्यर्थ हीं दण्डित हो गया इस विचार से करुणा के कारण शंकर ने अपने सिर पर धारण कर लिया।
चन्द्रमा को मन का प्रतीक बतलाया गया है और मन है जीव की उपाधि। जब तक मन भगवद् ज्ञानाकार नहीं बनता तब तक वह शिव का आभूषण नहीं बन सकता। निर्विशेष ज्ञान की सूक्ष्मता बताने के लिए हीं शंकर द्वितीया का हीं चन्द्रमा सतत धारण करते हैं। शिव के सर्वोत्तम प्रकाश को मन हीं ग्रहण कर के जीव को बन्धन से मुक्त बनाता है। चन्द्रमा की कालिमा मन की वासना को बतलाती है। निर्वासनिक होना हीं शशिशेखर की उपासना है।
|
|
| |
|
------------------------------------------------------ |
| |
| |
| |
| |
| |
| |
| |
| |
| |
| |
| |
| |
|
 |
|
|
|
|
|
|
|
|
शिव कथा |
|
|
| |
मकर संक्राति |
|
|
| |
शिव नाम प्रवचन |
|
|
| |
महा शिव रात्रि |
|
|
|
|
|
|
|
|
| |
|
| |
संर्पक
श्री वेदनाथ महादेव मंदिर
एफ / आर - 4 फेस – 1,
अशोक विहार, दिल्ली – 110052
दूरभाष : 09312473725, 09873702316,
011-47091354
|
|
| |
|
|
|