यज्ञरूप होने के कारण शिव को यज्ञमय कहा जाता है। वेद में वर्णित जितने यज्ञ हैं, वे सभी शिवरूप हीं है। शिव केवल हवि या देवता नहीं है, जो होम है वह भी शिव रूप हीं है।
दूसरी व्याख्या के अनुसार जिससे यज्ञ जल्दी पहुँचता हो, उसे यज्ञमय कहा जाता है। शिव हीं यज्ञ के एकमात्र फलदाता हैं इसलिए वे यज्ञमय हैं। हमारी सूक्ष्म से सूक्ष्म चेष्टा भी साक्षी को तुरत ज्ञात हो जाती है। इस प्रकार, जो भी विषयों का ज्ञान हमें हो रहा है उसे शिव हीं जानते हैं, यही उनकी यज्ञमयता है।
अथवा जहाँ कहीं भी, जब भी कोई यज्ञ करता है शिव उसे ग्रहण करने के लिए अविलम्ब उपस्थित हो जाते हैं इसलिए यज्ञमय कहलाते हैं। अचार्य भास्कर ने तो शिव के शरीर को हीं यज्ञमय स्वीकार किया है–
वेद: पादो यूपो दंष्ट्राSनलचयनरसनवदनस्तनूरुहधर्मक:
स्त्रौवश्चञ्चु: सर्पिर्नासो दिवसरजनिनयनयुग: कर: सवनत्रयम्।
औद्गत्रान्त्रो वेदीस्कन्धश्चरणयुगलमुपनिषद: प्रवर्ग्यकचभ्रमि:
वक्षो दाक्षिण्यो मन्त्रस्फिग् विविधमखकरणतनुकोSसि यज्ञमय:।।
अर्थात् श्रुतिरूप है आपका एक चौथाई शरीर। यूप आपकी दाढ़ है। आप अग्निरूप जीभवाले और चयनरूप मुख वाले हैं। आपके रोम हीं साक्षात् धर्मरूप है। स्त्रुवा आपकी नाक की नोक है। घी आपकी नासिका है। दोनो आँखें रात और दिन है। तीन सवन आपके हाथ है। आप औद्गात्र रूप आँत वाले हैं। वेदी रूप कंधे वाले एवं उपनिषद रूप पैर वाले हैं। प्रवर्ग्य आपकी जटा है। दक्षिणा आपका सीना है। मन्त्र आपके नितम्ब हैं। इसप्रकार यज्ञ के नाना साधनों से घ्टित आपका शरीर होने के कारण आप यज्ञमय कहे जाते हैं। यज्ञ को शिवमय समझना हीं यज्ञमय की उपासना है।