वामदेव

ज्ञान प्रकाश के द्वारा सब को प्रकाशित करने वाला होने के कारण शिव को वामदेव कहा जाता है। शिव का प्रकाश अत्यन्त सुन्दर और सौम्य है। यह अति तेज होने पर भी कभी असहनीय अवस्था को प्राप्त नहीं करता है। अन्य प्रकृति से उत्पन्न जितने पदार्थ हैं वे दूसरे से प्रकाश लेकर प्रकाश वाला बनते हैं पर वामदेव अपने प्रकाश से हीं प्रकाशित होते हैं। कोषों के अनुसार वाम और देव के अनेक अर्थ हैं। वाम का अर्थ है शोभन या सुन्दर और देव का अर्थ है द्युति यानि सुन्दर प्रकाश वाला। प्रकाश की सुन्दरता यही है कि वह स्वकीय होना चाहिये। शिव आत्म तत्व होने के कारण पर प्रकाश्य नहीं है। जिसे सूतसंहिता बडे़ सुन्दर शब्दों में बतलाती है–

जडं हि गम्यतेSन्येन नाSजडं मुनि पुंगवा:।
शिवो नैव जड: साक्षात् स्वप्रकाशैकलक्षण:।।

अर्थात् जड़ हीं दूसरे के द्वारा जाना जाता है। जड़ से विलक्षण होने के कारण शिव चेतन है इसलिए वे स्वयं प्रकाश है। भास्करराय तो इस नाम की अतिसुन्दर व्याख्या करते हैं–

वामार्धेन क्रीडसि त्वं त्रिलोकीवक्राचारो वल्गुमोदोSसि तस्मात्।
विश्वोत्तीर्ण: स्त्रष्टृतामप्यतीत: प्रेयानात्मा कथ्यसे वामदेव:।।

अर्थात् शक्तिरूपी वामांग के द्वारा आप क्रीड़ा करते हैं जिससे आपका अपना स्वरूप सर्जकता के दोष से असंसपृष्ट रहता है, तीनों लोकों से उल्टे आचार वाले हैं जिससे सारे संसार से विलक्षण हैं। आप अतिसुन्दर ढंग से आनंदित हैं इसलिए वामदेव कहे जाते हैं। अविद्या शक्ति को दबाकर विद्या शक्ति के द्वारा अपनी स्वयं प्रकाशता का ज्ञान हीं वामदेव की उपासना है।


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देवों के देव महादेव हैं अद्वितीय...

भारत के गरिमायुक्त ग्रंथ शिवपुराण में शिव और शक्ति में समानता बताई गई है और कहा गया है कि दोनों को एक-दूसरे की जरूरत रहती है। न तो शिव के बिना शक्ति का अस्तित्व है और न शक्ति के बिना शिव का। शिव पुराण में यह भी दर्ज है कि जो शक्ति संपन्न हैं, उनके स्वरूप में कोई अंतर नहीं मानना चाहिए। भगवती पराशक्ति उमा ने इंद्र-आदि समस्त देवताओं से स्वयं कहा है कि ‘मैं ही परब्रह्म, परम-ज्योति, प्रणव-रूपिणी तथा युगल रूप धारिणी हूं।

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