विरूपाक्ष

शंकर की इन्द्रियाँ और रूप विलक्षण है इसलिए वे विरूपाक्ष कहे जाते हैं। विरूपाक्ष का एक अर्थ रूप और अक्ष से रहित होना भी है। असुन्दर आँख वाले होने के कारण भी शिव को विरूपाक्ष कहते हैं।
कहाँ तो शिव वामदेव हैं और कहाँ विरूपाक्ष। इन दोनों चीजों को शिव अपने में समेट लेते हैं। सारे प्राणियों के दो नेत्र होते हैं पर शिव की आँखे तीन हैं इसलिए वे विरूपाक्ष कहे जाते हैं। भगवान शंकर के तीन नेत्र ज्ञान, इच्छा और क्रिया हीं है। नेत्रा का अर्थ होता है– ले जाने वाला। ये तीन नेत्रा हीं भगवान को संसार में लाते हैं। ज्ञान, इच्छा और क्रिया के द्वारा हीं वह सृष्टि, स्थिति और प्रलय करता है। सामान्य प्राणियों की इन्द्रियाँ महाभूतों के अंशों से निखमत होती है पर परमात्मा अपने भक्तो पर अनुग्रह करने के लिए अपनी माया शक्ति के द्वारा हीं इन्द्रियों की कल्पना कर लेता है इसलिए उसमें कर्तापना या भोक्तापना नहीं आ पाता है।
विरूपाक्ष नाम भी वेद प्रसिद्ध है। महानारायाण उपनिषद् विरूपाक्ष को बार–बार प्रणाम करती है– विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नम:। इस नाम की आलबाल अपने ढंग से व्याख्या करता है–

विषमणि विवि्धशक्तीफीन्यक्षीणि विलक्षणानि वाक्षाणि।
हर! हेमकूटशैले लिंगे व्यक्तोSस्यतो विरूपाक्ष:।।

अर्थात् हे हर! आपके लोचंन विषम है, आप विविध शक्तियों वाले हैं, आपकी इन्द्रियाँ विलक्षण है और आप हेमकूट पर्वत पर विरूपाक्ष लिंग रूप से स्थापित हैं अतएव आप विरूपाक्ष कहे जाते हैं। वस्तुत: हमारी इन्द्रियाँ विषय को देखती हैं और शिव की इन्द्रियाँ चेतन को देखकर मानो विषय को नंगा कर देती हैं इसलिए उन्हें विरूपाक्ष कहा जाता है।

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