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ॐ नम: शिवाय
 
 
 
 
 
 
श्री शिवयोगी रघुवंश पुरी जी
   
 

शिव के 108 नाम

कपर्दी

करुणासागर कपाली के जटाजूट से गंगा प्रवहित होती है। ‘कपर्द’ का अर्थ होता है ‘जटाजूट’ और इसे धारण करने के कारण शंकर को कपर्दी कहा जाता है। धरती पर आने से पहले गंगा शंकर की जटा में ही भ्रमण कर रही थी। गंगा को यह गर्व था कि मैं जहाँ पर गिरूँगी उस जगह को तोड़ती फोड़ती हुई पाताल में प्रवेश कर जाऊँगी, पर हुआ उल्टा। शंकर ने अपने जटा रूपी कटाह में ही गंगा को रोक लिया। जब भ्रमण करते करते रास्ता नहीं सूझा, तब गंगा रोने लगी। कामारी को करुणा आ गई और एक बाल केवल हटा दिया जिसे गंगा को रास्ता मिल गया और गंगा का गर्व भी खर्व हो गया। इस प्रसंग का मनोहर वर्णन रावण ने अपने शिवताण्डव में किया है

जटाकटाह संभ्रमन् भ्रमन्निलिम्पनिर्झरि
विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद् धगद् धगद् ज्वलललाटपट्टपावके
किशोरचन्शेखरे रति: प्रतिक्षणं मम।।

कपर्दी से शंकर का तपस्वी होना भी लक्षित होता है। तपस्वी अवश्यमेव जटा धारण करते हैं– जटाभि: तापस:। अधयात्म में आकाश हीं शंकर के केश हैं जिसमें मेघ विचरण करते रहते हैं और उन्हीं से सारा जल प्राप्त होते रहता है। नटराज मूर्ति में भी आकाश को हीं जटा बतलाया गया है। देवनदी के प्रवाह से शोधित होने के कारण, अमर सरिता को पुनीत करने के कारण और पृथ्वी पर बहने के लिए गंगा प्रवाह प्रदान करने के कारण, गुँथे बाल धारण करने के कारण अथवा मरालावतार में रस्सी की माला धारण करने के कारण शंकर को कपर्दी कहा जाता है। सब कष्टों को सहकर तप करना कपर्दी की उपासना है।


 
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