नीललोहित

भगवान् शंकर का नीललोहित नाम प्रकृतिपुरुषात्मक रूप को बतलाता है। नीले और लाल रंग के मिश्रण के कारण हीं शिव को नीललोहित कहा जाता है। वस्तुत: यह रूप भगवान् की अष्टमूर्ति में से, अग्निमूर्ति के तरफ इशारा करता है क्योंकि अग्नि का ऊपरी भाग लाल और नीचे का भाग काला होता है। शंकर साक्षात् अग्नि के रूप हैं इसलिए इन्हें नीललोहित कहा जाता है।
नीललोहित नाम से अर्धनारीश्वर रूप को भी समझा जा सकता है। भगवान् शिव कपूर की तरह अत्यन्त गौर वर्ण के हैं और भगवती काली तीसी (अतसी) पुष्प के समान नीले वर्ण की हैं। जब भगवान शंकर भगवती को अपने आधे शरीर में स्थान दे देतें हैं, तब गौर होने के कारण नील संपर्क से लालिमा उभर आती है। काली की कालिमा दबकर नीलिमा में बदल जाती है तब शंकर नीललोहित हो जाते हैं।
कहीं–कहीं नीललोहित का रहस्य कंठ की नीलिमा और चेहरे की लालिमा को लेकर बतलाया जाता है। नील और लोहित होने के कारण शिव नीललोहित हो जाते हैं। उपनिषदों में अग्नि सोमरूपता का वर्णन नीललोहित के रूप में प्राप्त होता है।
पुराण के अनुसार तो, पुत्रार्थी ब्रह्मा ने शिव के निमित्त यज्ञ किया। उस यज्ञाग्नि की गर्मी से स्वेदकण उभर आए। एक कण नीला और दूसरा कण लोहित था। उसीसे रूद्र प्रकट होकर नीललोहित कहलाए। भास्कर राय तो नीललोहित का अर्थ इस प्रकार समझाते हैं–

नेमाङ्गनं प्रकृतिपूरुषं रवेरन्तश्च रूपयुगपद्वपुस्तव।
वधोSलिकाम्बुकणतोSरुणासिताज्जात: शिव! त्वमिति नीललोहित:।।

अध्यात्म में तो अज्ञान को हीं नीला और अज्ञान नाशक को लाल कहा गया है। शिव हीं अज्ञान का नाश करते हैं इसलिए वे नीललोहित हैं।

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