अर्ध कुंभ
होलिका पूजन के समय सभी को एक लोटा जल, कुँकू, चावल, गंध, पुष्प, कच्चा सूत, गुड, साबुत हल्दी, मूँग, बताशे, गुलाल और नारियल आदि से पूजन करना चाहिए। सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होलिका में अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी जाती है। अग्नि प्रज्ज्वलित होते ही डंडे को बाहर निकाल लिया जाता है।
होलिका के चारों ओर कच्चे सूत को सात या तीन परिक्रमा करते हुए लपेटा जाता है। तत्पश्चात लोटे का शुद्ध जल व अन्य पूजन की सभी वस्तुओं को एक-एक करके होलिका को समर्पित किया जाता है। कँकू, चावल व पुष्प का पूजा में उपयोग किया जाता है। सुगंधित फूलों का प्रयोग कर पंचोपचार विधि से होलिका का पूजन करके पूजन के बाद जल से अर्ध्य दिया जाता है।
होलिका पूजन के समय 'अहकूटा भयत्रस्तैः कृता त्वं होलि बालिशैः अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम्। मंत्र का उच्चारण करना चाहिए।
होलिका दहन होने के बाद होलिका में वस्तुओं की आहुति दी जाती है, उनमें प्रमुख तौर पर कच्चे आम, नारियल, सात प्रकार के धान्य यानी गेहूँ, उडद, मूँग, चना, जौ, चावल और मसूर आदि सात धान्यों से होली की पूजन किया जाता है। इस पूजन के समय ध्यान में रखने योग्य बात यह है कि आपका मुँह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखकर ही पूजा में उपरोक्त सामग्री का प्रयोग करें। साथ ही होली के समय आने वाली नई फसलों के धान्य को खासकर होली में अर्पित करके पूजन किया जाता है। और होलिका माँ से अच्छे धन-धान्य और अच्छे जीवन की माँग की जाती है।
होलिका दहन के मुहूर्त के समय जल, मौली, फूल, गुलाल तथा गुड़ आदि से होलिका का पूजन करने के बाद गोबर से बनाई गई ढाल व खिलौनों की चार मालाएँ- जिनमें पहली पितृ, दूसरी शीतला माँ, तीसरी रामभक्त हनुमान तथा चौथी अपने घर-परिवार के नाम की लाकर अलग से घर में सुरक्षित रख ली जाती है।
सार्वजनिक होली से अग्नि लाकर घर में बनाई गई होली में अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है। अंत में सभी पुरुष कुँकू का टीका लगाते है और महिलाएँ होली के गीत गाती है। इस दिन घर के बुजुर्गों के चरण छूकर मंगलमय जीवन का आशीर्वाद लिया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार होली की बची हुई अग्नि और राख को अगले दिन सुबह घर में लाने से घर का और परिवार के सभी सदस्यों का अशुभ शक्तियों से बचाव होता है।
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देवों के देव महादेव हैं अद्वितीय...
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Plot no. 4
peeple wali gali
bharatmatapuram
bhupatwala
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Coyp Right 2012 shiv yogi

