रविजयमविजयमविजयपादम् पुरजितमरजितमरजितलोकम्।
असुरतरसुरतरसुरतनौकां प्रणमतिरणमतिरणमतिमन्दः॥
श्रीकण्ठकण्ठसितभासितनीलराशिः मन्दारदारुसुमनालिसुरागरावः।
हेरम्बलालनपरायणलोचनो यो शन्संहरो भवतु भस्मधरो भुजंगी॥
महेशं हर्षशैलान्तं सन्मुखं दृष्टिगोचरम्।
साक्षात् शिवं शिवंवन्दे कावरतत्वलब्धये॥
श्रावण-मास प्रारम्भ होते ही चारों तरफ भगवान शंकर के भक्तों द्वारा शिव-गुणगान प्रारम्भ हो जाता है। अनादि काल से यह महीना आशुतोष औढरदानी बाबा भोले नाथ का है। भगवान शिव का ही एक ऐसा परिवार है जिसमें सबकी पूजा होती है। भगवती जगदम्बा जो साक्षात् उमा भवानी हैं, उनकी पूजा दो बार होती है – चैत्र एवं आश्विन के नवरात्रों में। गणेश जी महाराज तो हर चतुर्थी को याद किये जाते हैं पर भाद्रपद की कृष्ण चतुर्थी को उनका विशेष प्रादुर्भाव महोत्सव मनाया जाता है। पूर्व-पश्चिम में तो नहीं, पर दक्षिण भारत में कार्तिक स्वामी जो वहां ’मुरुगन स्वामी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं, उनके बड़े-बड़े भव्य समारोह मनाये जाते हैं। यहाँ तक कि भगवान शंकर की महिमा से उनके वाहनों और गणों की भी पूजा होती है। वीरभद्र एवं भैरव की पूजा सर्वत्र होती है। सदाशिव का वाहन नन्दी (सांड़) भारतीय संस्कृति में अत्यंत आदरणीय एवं पूजनीय है। कोई किसान भी उसे गाड़ी या हल में प्रयोग नहीं करता है। भगवती का वाहन सिंह भगवती के साथ ही पूजा जाता है। राजस्थान की कर्णी माता मन्दिर में चूहों का स्थान सर्वविदित है। भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर तो साक्षात् ब्रह्मचर्य का प्रतीक है जिसका पंख परम शिवभक्त भगवान कृष्ण स्वयं धारण करते है। नाग पंचमी (भाई-पंचम) को हम सनातनी लोग सर्प की पूजा करते हैं और उसके लिये दूध चढ़ाते हैं। भगवान सदाशिव के सिर पर विराजमान भागीरथी गंगा तो साक्षात् मोक्षदायिनी हैं जिनकी पूजा जन-जन करता है। चन्द्रमा कलंकी और अपराधी होते हुये भी शिव-सान्निध्य के कारण करवा-चौथ को सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा पूजा जाता है। भगवान शंकर के नेत्र में रहने वाले सूर्य की उपासना तो प्रातःकाल हर सनातनी व्यक्ति अर्घ्य दान द्वारा करता है जो आयुष्य और नेत्र ज्योति बढ़ाने वाला है। भगवान महेश्वर के मध्य नेत्र में रहने वाले अग्नि की महत्ता तो सबको ज्ञात है। यज्ञ में अग्नि देवता का आवाहन एवं पूजन विधिवत् किया जाता है। शिव के अश्रु स्वरुप रुद्राक्ष की पूजा होती है। हम नाद-ब्रह्म रूप डमरू और भव-भंजक त्रिशूल की भी पूजा करते हैं। नागा-लोग नागफनी एवं खप्पर की भी पूजा करते हैं। परमहंस सम्प्रदाय में तो धूनी एवं भस्म-पिण्डी की भी पूजा की जाती है। शम्भु के सान्निध्य में ऐसा कौन है जिसकी सपर्या (पूजा) नहीं हुई। भगवान शंकर की पूजा से सब देव प्रसन्न हो जाते हैं क्योंकि शंकर देवों के देव महादेव हैं। हर प्राणी शिव की आराधना कर सकता है। पहले तो सम्पूर्ण-विश्व में शिव मात्र की ही पूजा होती थी, किन्तु बाद में कलिकाल के प्रभाव से मतवादों के चक्कर में पड़कर मनुष्य शिव-पूजा विमुख हो गया। आज भी प्राचीन खुदाईयों में शिवलिंग का मिलना इसका प्रमाण है। भले ही नाम एवं रूप अलग हों पर है तो वह शिव ही। सनातनी हिन्दु, जैन, सिख, निराकारी आदि सब शिव की ही पूजा करते हैं। सगुण-साकार की पूजा सरल एवं निर्गुण-निराकार की उपासना शास्त्रों ने कठिन बतलायी है। ॠषियों ने ऐसी विधा की खोज की जिससे सहजता से शिव प्राप्ति हो जाये और हम परम शिवतत्व को जानकर मोक्ष के अधिकारी बन सकें।
भगवान शंकर को सब से ज्यादा प्रेम जलधारा से है। सारे देवता नाना प्रकार की भोग सामग्रियों से संतुष्ट होते है- जैसे गणेशजी को मोदक, कृष्ण जी को माखन-मिश्री, देवी जी को हलवा (कडाह प्रसाद) तो भैरव जी को सोमरस। लेकिन हमारे भोले बाबा तो केवल जल चढ़ाकर ‘बं बं’ करने से ही प्रसन्न हो जाते हैं। शास्त्र भी कहता है – ‘जलधाराप्रियः शिवः’। बाबा का पूजन भी सबसे सरल है जिसमें मिट्टी की मूर्ति यानी पार्थिव लिंग बनाया और गंगा से जल भर कर लाये और उसे चढ़ाकर ऊपर से आक-धतूरा-बिल्व पत्र चढ़ा दिये, इसी से शिव अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शंकर भोले नाथ हैं और भोलों से ही प्रेम करते हैं। छल-प्रपंच-कपट तो उन्हें छू भी नहीं सकता है। इसलिये रामचरितमानस भी कहता है—
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
बाबा को छ्ली-कपटी प्राप्त नहीं कर सकते। उसके लिये तो बालक जैसा स्वभाव चाहिये। जैसे बाबा भोले नाथ, वैसे ही उनके भक्त। गरीब से गरीब आदमी भी आशुतोष की पूजा कर सकता है क्योंकि उनकी कोई माँग ही नहीं हैं। भगवान तो केवल प्यारे भक्तों के भाव के भूखे हैं। अपना भाव हम कैसे व्यक्त करते हैं ये हमारे ऊपर निर्भर है। पूजा में क्रिया के साथ ही प्रगाढ़ प्रेम की परम आवश्यकता है। वे जानते हैं कि आप उनके दर्शन के लिये आये हो या संसार में प्रदर्शन के लिये? आप उनका नाम का प्रकाश करते हो या अपने नाम का प्रचार? आप उनका काम करते हो या अपना धन्धा? भोलेनाथ तो सबके हृदय में बैठकर साक्षी भाव से सबके कार्य को निरन्तर देख रहे हैं।
ये बताइये कि क्या गंगाधर के पास जल की कोई कमी है या महेश्वर के पास प्रकाश का कोई अभाव है? त्रिलोकीनाथ को ऐश्वर्य की कोई आवश्यकता नहीं है। वह तो मनमौजी देव हैं। सब कुछ होने पर भी वह श्मशान की शान बढ़ाते हैं और सबको देने के बावजूद स्वयं भिक्षाटन करते हैं। इसलिये किसी कवि ने कहा है –
स्वय महेशःश्वसुरोनगेशः सखा धनेशस्तनयो गणेशः।
तथापि भिक्षाटनमेव शम्भुर्बलीयसी केवलमिश्वरेच्छा॥
शिव सर्वतन्त्र स्वतंत्र देवता हैं। अपने कानून के अनुसार चलते हैं महेश्वर। जैसे राष्ट्रपति को विशेष अधिकार प्राप्त होता है, वैसे ही त्रिलोकाधिपति को विशेष अधिकार प्राप्त है। वह चाहें तो एक पल में ही सृष्टि का प्रलय कर देवें। अकारण करूणा वरूणालय हिमालयवासी कैलासी किसी का भी उद्धार कर देते हैं। ये कब या कैसे प्रसन्न हो जायेगें, यह कोई नहीं कह सकता है। बड़े-बड़े देवता भी जिनकी चरण रज के लिये लालायित रहते हैं, वे भोलेनाथ अपने भक्तों के वशीभूत हैं। प्रेम की डोर में अघोर बंधते देर नहीं करते। आज तक भगवान शंकर ने किस देवता को खाली हाथ लौटाया? विष्णुजी की भक्ति के वशीभूत होकर उन्हें अपना चक्र और धनुष दे दिया। कुबेर को सारे ऐश्वर्य देकर धनाधीश बना दिया। इन्द्र को स्वर्ग का राज्य दे दिया। जिसने जो भी माँगा उसे बाबा ने एवमस्तु कर दिया। कभी-कभी स्वयं भी वरदान देने के चक्कर में भस्मासुर से परेशान हो उठे और दिव्य लीला दिखा दी। ऐसे भोलेनाथ को ही सावन में शिवरात्रि के दिन शिवभक्त ‘कावड़’ चढ़ाते हैं।
घर से जब कावड़ियाँ संकल्प उठाता है तभी से उसका ‘कावड़’ प्रारम्भ हो जाता है। कई कावड़िये तो गोमुख तक भी जाते है। वहाँ गंगा स्नान करके अपने तन-मन को पवित्र बनाकर, भभूत लपेट कर, पवित्र-घट में संकल्पपूर्वक गंगा-जल भरकर उसकी पूजा करते हैं। फिर ‘हर हर महादेव’ का जयकारा लगाकर ‘कावड़’ उठा लेते हैं। हर कावड़िया एक तपस्वी होता है, अतः उसे तपस्वी के कठोर नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। सबसे पहले भगवान शंकर को ‘कावड़’ किसने चढ़ाया यह तो एक रहस्य ही है। परन्तु पुराणों और लौकिक कथाओं के माध्यम से पता चलता है कि जिस समय सुर-असुर मिलकर उदधि मन्थन कर रहे थे उसी समय महाकाल की ज्वाला जैसा धधकता हुआ हलाहल विष प्रकट हुआ। उस काले कालकूट से हर कोई प्राणी भयभीत हो उठा। देवता तक पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाये। भगवान विष्णु का तो रंग ही उसकी ज्वाला से काला हो गया और वे श्यामसुन्दर बन गये। तब देवताओं और दानवों की सभा में भयंकर कोलाहल हुआ कि कौन धारण करेगा यह जहर? हर की नज़र हर की नज़र पर थी, लेकिन सब संशंकित थे कि बाबा ने मना कर दिया तो क्या होगा? भगवान विष्णु आगे आये और भोलेनाथ से निवेदन किया – हे भगवन्! लोक कल्याण के लिये यह ‘कल्मष’ आप ही धारण करें। एक तरफ हृषीकेश का आग्रह और दूसरी तरफ पार्वती का निषेध। किसकी मानें और किसको मना करें? भगवान भोलेनाथ ने प्याला उठाया और पी लिया उस जहर को। न बाहर रखा न अंदर जाने दिया। क्योंकि अंदर तो सारा ब्रह्माण्ड है, अंदर जहर जाता तो सारे प्राणी मर जाते। बाहर रहता तो भय और अंदर जाता तो नाश। इसलिए बाबा ने कण्ठ में ही उसे धारण कर लिया और भक्त पुकार उठे – “जय हो नीलकण्ठ महादेव की!” लोकोक्ति है कि उस जहर के ताप से भगवान भोले नाथ भी बावले हो उठे। शिव तो लीलाधारी हैं, कब कैसी लीला करेगें वे ही जानते है। सागर एवं पर्वत मालाओं को लाँघते-लाँघते बाबा हृषीकेश हिमालयखण्ड में आ बैठे। वहीं पर देवताओं ने गंगाजल के द्वारा उनका महाभिषेक किया और तब से नीलकण्ठ महादेव प्रतिष्ठापित हो गये। सबसे पहले देवताओं ने ही महादेव का महाभिषेक और महाश्रृंगार किया। रावण भी भगवान शंकर का अभिषेक गंगाजल से करता था। यहाँ तक कि अभिषेक के लिये अपनी लंका नगरी में उसने गंगाजल का कुण्ड बना दिया था जहां से वह स्वयं जल लाकर शिव का अभिषेक करता था। रामायण में प्रसिद्ध है कि युद्ध के समय भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने शिवजी की प्रसन्नता के लिये शिवलिंग स्थापित कर स्वयं अपने करकमलों से अनेक तीर्थों से लाये गये पवित्र जल के द्वारा ‘रामेश्वर’ ज्योर्तिलिंग का महाभिषेक किया और रावण के ऊपर विजय प्राप्त की। उसी की स्मृति में आज भी लोग गोमुख से रामेश्वरम् तक की कठिन पैदल यात्रा करके गोमुख से लाये गये जल को भगवान ‘रामेश्वर’ को अर्पित कर अपना जीवन धन्य बनाते हैं।
‘कावड़’ के प्रसंग में ही एक प्राचीन कथानक स्मरणीय है—एक बार संत एकनाथ जी गंगोत्री से गंगाजल भरकर यानि ‘कावड़’ उठाकर, रामेश्वर की ओर पैदल यात्रा करते हुये ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ पानी का अत्यन्त अभाव था। उनके साथ में कई संगी-साथी भी थे । उसी रास्ते में बिन पानी के एक गदहा तड़प रहा था। लोग उसे देखते और आगे निकल जाते। एकनाथजी उस रास्ते से जाते समय यह नज़ारा देखकर शास्त्रों की, संतो की यह बात याद करने लगे कि हर प्राणी में शिव का वास है। यह देह ही देवालय है और इस देह में यह चेतन देव ही शिव है। जब गदहे के रुप में यह चेतन देव तड़प रहे हैं तो इन्हें छोड़कर मैं रामेश्वर कैसे जा सकता हूँ? मैं तो अपने शिव को यहीं मनाऊँगा। ऐसा सोचकर वह हर-हर महादेव कहते हुए गंगाजल गदहे के मुँह में डालने लगे। उनके सभी संगी-साथियों ने बहुत समझाया कि अरे! ये तो गदहा है। मर भी जायेगा तो क्या फर्क पड़ जाएगा? लेकिन एकनाथ तो सच्चे संत थे। हर जीव में शिव का दर्शन करते थे। और चमत्कार यह हुआ कि उसी गदहे के मुख में उन्हें भगवान भोलेनाथ का दर्शन हो गया। सारी मनोकामनायें पूर्ण हो गयीं। किसी प्राणी का अपमान करके किया हुआ पूजन कभी सफल नहीं होता है। किसी पीड़ित की उपेक्षा करना शिव का ही अपमान है।
इस घटना से भी ‘कावड़’ की प्राचीनता का पता चलता है। यानि ‘कावड़’ की प्रथा नवीन और मनःकल्पित नहीं है। शतघटाभिषेक एवं सहस्रघटाभिषेक तो शास्त्रों में बहुत प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में जब किसी राजकुमार को ‘राजा’ बनाया जाता था उस समय सारे तीर्थों के जल से उसका महाभिषेक किया जाता था। वैदिक सूक्तों के पावन वातावरण में सनातन संस्कृति के संस्कारों से उसे अभिसिंचित किया जाता था और उसे स्मरण दिलाया जाता था कि केवल प्रजा ही नहीं, अपितु तीर्थों और आचार्यों की रक्षा का दायित्व भी उस पर ही है। नदियों की पावनता का भी ध्यान राजा को भलीभाँति रखना चाहिये क्योंकि ये जनजीवन की जीवनधारा हैं।
दूसरी कथा है कि प्रसिद्ध संत नामदेव महाराज कावड़ लेकर शिवाभिषेक के लिये प्रस्थान कर चुके थे। आधा रास्ता तय हो चुका था लेकिन बाबा भोलेनाथ बीच में ही परीक्षा लेने लग गये। उन्होंने साँड बनकर गंगाजल के घट को तोड़कर नष्ट कर दिया। जल जमीन पर बिखर गया पर नामदेवजी ने हार नहीं मानी। दूसरी बार जल भरकर फिर उसी रास्ते से आ पड़े और फिर वही लीला हुई। जब बिना क्रोध किये तीसरी बार जल भरने के लिये प्रस्थान करने लगे तो भगवान महेश्वर ने अपने गणों सहित वहीं पर दर्शन देकर नामदेवजी को कृतार्थ किया और उनकी शिवयात्रा शिवसंकल्प-शिव पर जाकर पूर्ण हुई।
हर कल्प में कपाली की कौतुकमयी लीला होती है। हिमाचल में भी भगवान शंकर का ‘नीलकंठ महादेव’ नाम से प्रसिद्ध स्थान है जो मणिकूट, विष्णुकूट और ब्रह्मकूट पर्वत के मध्य तथा मणिभद्रा एवं चन्द्रभद्रा नदी के संगम पर स्थित है। वहाँ भी भगवान वटवृक्ष के मूल में समाधिस्थ होकर विष की विषमता को शमन करते हुये समता अभ्यास कर रहे थे और 40 हजार वर्ष तक देवताओं को इसका पता नही चला। अंत में देवताओं ने महादेव का महाभिषेक सम्पन्न किया। इन समस्त पौराणिक व लौकिक आख्यानों से यह पता चलता है कि ‘कावड़’ चढ़ाने की प्रथा अत्यंत प्राचीन है और हर शिव भक्त जीवन में एक बार बाबा का अवश्य तपपूर्वक अभिषेक करना चाहता है। राजोपचार तो सभी के लिये संभव नहीं है, अतः जल मात्र से ही शंकर संतुष्ट हो जाते हैं।
अस्तु! कावड़ उठाने वाला भक्त शिव-साधक है, शिवयोगी है। शिव के मार्ग पर अपने को समर्पित करने वाला भक्त सामान्य नहीं होता। वह शिव की तरह ही सहनशील होता है। मन-वाणी या कर्म से किसी भी प्राणी का वह अपकार नहीं करता। सबमें एकमात्र सदाशिव का ही दर्शन करता है। वह केवल घट में ही पवित्र जल नहीं भरता है, अपितु अपने काया रूपी घट में जो ऊपरी भाग मस्तिष्क है, उसमें और हृदय में ज्ञान और प्रेम भरकर अपने को परम-पुनीत बनाता है। जब कावड़ के दो घट पूर्ण कर लिये जाते हैं तो उसे एक बाँस की डण्डी में सजा-धजा कर और पूजित करके स्थापित कर दिया जाता है। पहला है ब्रह्मघट और दूसरा है विष्णुघट। रुद्र तो साक्षात् बाँस में ही प्रतिष्ठापित है। वेणुगीत में बाँस की बाँसुरी को साक्षात् रुद्र स्वीकार किया गया है। यानि कावड़ियाँ अपने को साक्षात् ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मक समझकर ही शिव की पूजा करे। कावड़ ले जाते समय शुद्धता का बड़ा ध्यान रखा जाता है। जब तक कावड़ अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच जाये, तब तक धरती पर नहीं रखा जाता। उसे किसी बाँस-बल्ली के आधार (स्टैंड) पर ही रखा जाता है। कावड़ में कन्धा बदलते समय भी यह ध्यान रखा जाता है कि पीछे से न बदलें। उसे आगे से घुमाकर ही दूसरे कन्धे पर लेवें। एक काँवड़ को दूसरे के ऊपर से भी नहीं गुजारते। यह अपराध है। रास्ते में गूलर का पेड़ पड़ जाये तो उसके नीचे से भी नहीं गुजरते क्योंकि वह कर्म का प्रतीक है और साधक ज्ञान की तरफ बढ़ रहा है। नींद आना भी अशुद्धता है, इसलिए सोने के बाद स्नान और प्रार्थनापूर्वक ही काँवड़ उठाया जाता है। साधक को सतत ध्यान रखना चाहिये कि मुख से केवल भगवान शंकर के मंत्र और भजन निकलें, न कि कोई गाली-गलौज या अपशब्द। खान-पान में भी कावड़िये को विशेष सावधान रहना चाहिये। ऐसा कुछ न खायें जिससे व्रत खण्डित हो। आजकल भाँग व शराब का नशा भी लोग करने लगे हैं। अथवा चिलम, गाँजे और अफीम का सेवन करते हैं जो धर्म के अत्यंत विरूद्ध है। भगवान शंकर को ये सब चीजें भोग नहीं लगाई जाती हैं। कहीं भी शास्त्र में यह वर्णन नहीं मिलता है कि शंकरजी ने भाँग पी, अफीम खाई या चिलम का सेवन किया। भगवान शंकर तो जहर पीते हैं। शिव धर्म को कलंकित करने का प्रयास करने वाला शिवद्रोही होता है और समय आने पर उसे अवश्य ही दण्ड मिलता है। अतः साधक ऐसा कोई आचरण न करे जिससे सनातन धर्म कलंकित हो और नास्तिकों को उंगली उठाने का अवसर प्राप्त होवे।
सनातन धर्म क्रिया की सूक्ष्मता को भलीभाँति समझता है। कौन सी क्रिया चेतना को ऊर्ध्वमुखी और कौन सी क्रिया चेतना को अधोमुखी करती है, उसे ही धर्म और अधर्म की संज्ञा दी गई है। अपनी दिव्यदृष्टि के द्वारा परमहंस तत्त्ववेत्ता उस रहस्य को जानते हैं। इसलिये मनु महाराज भी कहते हैं कि क्रिया के सम्पूर्ण फल को प्राप्त करने के लिये उसके आध्यात्मिक पहलू को समझना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा पूर्ण फल की प्राप्ति नहीं हो सकती है। “नहि अनध्यात्मविद् कश्चित् क्रियायाः फलमश्नुते।“ अतः हमें भी ‘कावड़’ के आध्यात्मिक पहलुओं का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। इस ‘कावड़’ का लक्ष्य क्या है? क्यों यह ‘कावड़’ प्रारम्भ हुआ? कैसे प्रारम्भ हुआ और इसका अंतिम ध्येय क्या है?
रहस्यदर्शियों ने इस काया को ही घट बतलाया है और आचार्य यास्क ‘जल’ का अर्थ कर्म करते है – ‘आपो वै कर्म’। इसलिये जब कोई कर्म प्रारम्भ करते है तो संकल्प में सबसे पहले हाथ में जल लेते हैं। इन दोनो अर्थों के अनुसंधान से यह पता चलता है कि अपने शरीर से उत्तम कर्मों को संचालित करना भी कावड़ का एक पक्ष है। अपनी चेतना को माया से छुड़ाने के लिये प्रथम सोपान है—सत्कर्म । सम्पूर्ण कर्मों व कर्मफलों को भगवान के प्रति समर्पण ही कावड़ का लक्ष्य है। कर्मफल के त्यागी को ही भगवान गीता में संन्यासी या योगी स्वीकार करते हैं। केवल कर्मों का त्याग करने वाला योगी या संन्यासी नहीं है। “यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधियते। स संन्यासी च योगी च न निरग्नि र्न चाक्रियः”। सन्तों ने इस कायारुपी घट को भक्ति के पवित्र गंगाजल से भरने के लिये भी ‘कावड़’ का प्रारम्भ बतलाया है। जल है स्नेह और जीवन का रस है प्रेम। हर प्राणी के प्रति स्नेह-भाव से पूर्ण हृदय होना ही शिव के प्रति ‘कावड़’ सर्मपण है। जैसे जल मिट्टी को आपस में संश्लेषित कर देता है वैसे ही प्राणियों को पास में लाता है स्नेह। स्नेह से सारा संसार अपना संबंधी नज़र आता है, अपने और पराये का भेद समाप्त हो जाता है।
‘कावड़’ जल के प्रति चेतनता का संदेश देता है। हम अपने मूल स्रोत को पहचानें। ‘कावड़’ नदियों के प्रति हमारे कर्त्तव्य का स्मरण दिलाता है। हम अपनी ही जीवनदायिनी नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं, फिर हमें कौन बचायेगा? ‘कावड़’ चढ़ाते समय यह भली प्रकार से ध्यान रहना चाहिये कि हम अपनी गंगा मैय्या को अशुद्ध या दूषित न करें। पुराने कावड़ों को हम वृक्ष पर टाँग सकते हैं। उन्हें गंगा में बहाने पर सारा कचरा सड़कर जल को गन्दा कर देगा तो उस जल से हम कैसे भगवान शिव का अभिषेक करेगें? कई बार कावड़ियों को गंगा में वस्त्र या जूते धोते भी देखा जाता है। जिस जल का हमें पान करना है, आचमन करना है, उसमें हम कभी यह विचार नहीं करते हैं कि हम क्या कर रहे हैं? यदि अनपढ़-गँवार-अनजान आदमी यह सब करता है तो वह तो क्षम्य है, पर आधुनिक पढ़े लिखे आस्तिकों में यह लापरवाही देखने में आती है जो नितांत चिन्ता का विषय है। हम धर्म कमा रहें हैं या धर्म के नाम पर केवल धोखाधड़ी कर रहें हैं? कावड़ियों को यह संकल्प करना चाहिये कि हम स्वयं गंगा को किसी भी प्रकार से प्रदूषित नहीं करेंगे और न किसी को करने देगें। ऐसा करने वालों का हम जबरदस्त प्रतिकार करेगें। अपने धर्म का रक्षण करना हर सनातनी का परम कर्त्तव्य है। संतों ने तो अपने शीश न्यौछावर करके भी धर्म की रक्षा की है। रक्षित धर्म ही प्राणी की रक्षा करता है – ‘धर्मों रक्षित रक्षितः’।
‘कावड़’ उठाते समय हमारा हृदय इस भाव से भरा होना चाहिये कि अपने जीवन को एक आदर्श जीवन बनायेंगे जिसमें व्यसनों की कोई जगह नहीं होगी। हमारा धन और बल, समाज की समरसता का पोषण करेगा। हर शोषण का हम विरोध करेंगें। धर्म का अर्थ यह नहीं है कि आप दूसरों को सतायें और सोचें कि आप से परमात्मा प्रसन्न हो जायेगा। ऐसा सोचना नितांत मूढ़ता है। कई साधकों को देखते हैं कि कावड़-काल में तो अद्भुत त्याग करते हैं पर ‘कावड़’ सम्पूर्ण होते ही वे भूतप्रेत की तरह आचरण करने लग जाते हैं जिसका कोई फायदा नहीं है। धर्म-कर्म से यदि आप की प्रकृति में कोई अन्तर नहीं आया या आपकी विकृति में कोई फर्क नहीं पड़ा तो सारा धर्म व्यर्थ का क्रियाकलाप है, एक व्यर्थ का प्रलाप है। इससे सनातन आस्था को भी ठेस पँहुचती है। यह तो वैसे ही हुआ जैसे कोई हाथी गंगा में खूब स्नान करे और बाहर आते ही अपने ऊपर मिट्टी-धूल डाल ले। इसे कहते हैं—गजस्नान। अतः हम अपने कर्त्तव्य के प्रति सावधान रहें ।
‘कावड़’ उठाते समय यह प्रतिज्ञा करनी चाहिये कि आज से हम दैवी संपदा के अधिकारी बनेंगे। आसुरी संपदा का तिरस्कार करेगें। रास्ते में कभी भी ऐसा व्यवहार न करें जिससें विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न हों और लोग हमसे भयभीत हों। हमारा चित्त तो सतत चिन्मय-चिन्तन से परिपूरित होना चाहिये। शिव बनकर ही शिव का यजन होता है। अशिव शिव का यजन कर ही नहीं सकता। अतः जैसे शिव गम्भीर धीर हैं वैसी ही धीरता साधक में भी होनी चाहिये। शिव के विषपान का रहस्य ही है कि हम सब प्रकार के विषों को अपने कण्ठ में ही धारण करें। उसे कभी भी बाहर न निकालें, नहीं तो परस्पर राग-द्वेष की अभिवृद्धि ही होगी। जग की विषमता का शमन करके समता का प्रचार करना ही साधक का लक्ष्य है।
आजकल ‘कावडिये’ भी संन्यासी जैसा वस्त्र धारण करने लगे हैं जो अग्नि का प्रतीक है । जैसे अग्नि सब विकारों को जला कर भस्म कर देती है वैसे ही ‘कांवडियाँ’ अपने विकारों के ऊपर विजय पाये तभी यह वस्त्रधारण सार्थक हो सकता है। भगवा रंग सूर्य के प्रकाश का रंग है। जैसे सूर्य गाढ़ अन्धकार का तिरस्कार कर देता है वैसे ही साधक अज्ञान का निर्वतन करके ज्ञान के प्रकाश से अपने हृदय-आकाश को आलोकित कर लेता है। आइये! वेदान्त की दृष्टि से देखते है कि ‘कावड़’ शब्द का आध्यात्मिक अर्थ क्या है? हमें ज्ञात है कि सम्पूर्ण विश्व की पहले एक ही मातृभाषा थी और वह थी संस्कृत। संस्कृत से ही बिगड़ कर सारी भाषाएं बनीं। फिर उन्हें बोलने का अपना-अपना अंदाज निकला, कहीं लम्बा तो कहीं छोटा, कहीं छोड़कर तो कहीं मिलाकर। भाषाविद् यह भलीभाँति जानते हैं कि उसी संस्कृत के बिगड़े रूप से निकली हमारी प्राकृत भाषाओं से हिन्दी का प्रादुर्भाव हुआ है। अतः ‘कावड़’ शब्द के मूल शब्द को भी हमें अवश्य ढूंढना चाहिये। मेरे विचार से ‘कावड़’ शब्द ‘कावर’ का अपभ्रंश है। आज भी कई प्रान्तों में ‘र’ को ‘ड’ बोलने की प्रथा है। भले ही यह भाषाविदों को अटपटा लगता हो पर जनता का तो अपना ही अंदाज होता है। भाषा किसी व्याकरण की मोहताज़ नहीं होती है। जनता जैसा बोलती है उसे वैसा ही स्वीकार कर लिया जाता है। हिन्दी में ट्रेन या मोटरकार क्यों स्त्रीलिंग है और तारा क्यों पुल्लिंग है, इसका उत्तर लोकभाषा ही है। इसलिये लोकभाषा को व्यवस्थित करता है व्याकरण। जब हम ‘कावर’ के अपभ्रंश के रूप में ‘कावड़’ को स्वीकार कर लेते हैं तो उसके कई अर्थ कोषों में प्रकट होते हैं जिस पर हम विचार करते हैं –
1. मेदिनी-कोष में ‘क’ का अर्थ ‘ब्रह्म’ है और उपनिषद् में ‘अवर’ का अर्थ ‘जीव’ है। “कश्च अवरश्च इति ‘कावरः” अर्थात ब्रह्म और जीव का मिलन यानि जीव के जीवत्व का त्याग और ब्रह्मरूपता की प्राप्ति ही ‘कावड़’ का आध्यात्मिक अर्थ है। जैसे जिज्ञासु ‘तत्वमसि’ महावाक्य का विचार करता है वैसे ही ‘कावर’ भी अनुसंधेय है। क्रियापद लुप्त होने पर भी अपनी तरफ से आहृत कर अर्थ का विचार किया जा सकता है।
2. क यानि ब्रह्म, अ यानि विष्णु, व यानि रुद्र, ये तीनों जिसमें रमण करें उसका नाम है ‘कावर’। “कश्च अश्च वश्च इति कावाः ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा यत्र रमन्ते स कावरः”। अर्थात ‘कावड़’ सामान्य वस्तु नहीं है। यदि उसके नियमों का सम्यक् पालन किया जाये तो वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर की शक्ति से परिपूरित है।
पुराणों में प्रसिद्ध है कि जल के द्वारा ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय हुआ।
3. “कस्य आवरः कावरः” अर्थात परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ वरदान है—‘कावड़’ । जिसे धारण कर साधक अपने जीवन को कृतार्थ करता है। जल ही सृष्टि के मूल का वरदान है। सबसे पहले सृष्टा ने ‘अप एव ससर्ज’ अर्थात् अपने से जल ही प्रकट किया है।
4. ‘क’ का अर्थ है जीव और ‘अ’ का अर्थ है विष्णु। यानि आत्मा और परमात्मा के मिलन का सर्वोत्तम वरदान है कावर। “कस्य अस्य वरः इति कावरः” अर्थात् जीव और सगुण साकार परमात्मा का उत्तम धाम है ‘कावर’।
5. ‘क’ अर्थ है ‘शीश’। “क इव आवर इति कावरः”। जैसे सारे अंगों में सिर प्रधान है वैसे ही शैवों के लिये ‘कावर’ का महत्व है। जैसे सिर से ब्राह्मणत्व या प्रधानता का ग्रहण होता है वैसे ही ‘कावर’ से ज्ञानश्रेष्ठता का प्रतिपादन होता है।
6. ‘कम्’ का अर्थ है ‘जल’ और ‘आवर’ का अर्थ है उसे व्यविस्थत करना। अर्थात् पूर्ण घटों को अपने लक्ष्य तक पहुँचा कर शिव को समर्पण करने का अर्थ है कावर।
7. ‘क’ का अर्थ है ‘समीर’ और ‘आवर’ का अर्थ है सम्यक् रूप से वरण करना। अर्थात हम वायु देवता का वरण करते हैं। जैसे वायु सबको सुख और आनन्द देता हुआ परम पावन बना देता है और अपनी ब्रह्मरूपता का दर्शन कराता है वैसे ही साधक अपने वातावरण को पावन बनाये। यह भी ‘कावर’ का एक अर्थ स्वीकृत किया जा सकता है।
8. ‘क’ का अर्थ है ‘अग्नितत्त्व’ अर्थात् वैश्वानर और ‘आवर’ का अर्थ है ठीक से वरण करना। हम अपने जीवन में अग्नि का वरण करते हैं। ‘अग्निमीडे पुरोहितम्’ इस वेद मंत्र के द्वारा भी हमें यह संदेश मिलता है क़ि कि जैसे पुरोहित हमारा मार्गदर्शन करता है वैसे ही अग्नि अर्थात् ‘अग्रे नयति इति अग्नि’ –परमात्मा हमारा मार्गदर्शक बने। यानि हम परमात्मा को अपना लक्ष्य बनायें, न कि सांसारिक भोग सामग्रियों को। अग्नि जैसे खाये हुये अन्न को पचाकर सम्पूर्ण शरीर को सबल बनाती है वैसे ही हम अपने राष्ट्र और समाज को सक्षम बनायें। यह भी ‘कावर’ का एक अर्थ स्वीकारणीय है।
9. ‘क’ का अर्थ है ‘आनन्द’, ‘आ’ का अर्थ है ‘सम्पूर्ण’, ‘वर’ का अर्थ है वरण करना अर्थात् हम आनन्दरूपता का सब तरह से वरण करते हैं। जो आनन्द का वरण करेगा वह दूसरों को कभी दुःख नहीं दे सकता है। उसका तो वाक्य ही है –
”सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्” अर्थात सब लोग सुखी होवें, सारे लोग निरोगी बनें, सब कल्याण के भागी बनें और कोई भी प्राणी दुःखी न होवे। यह भी ‘कावर’ का एक अर्थ आदरणीय हो सकता है।
10. ‘क’ का एक अर्थ है ‘विष्णु’ और ‘आवर’ का अर्थ है अपने जीवन में उतारना। अर्थात हम विष्णुतत्त्व का जीवन में अवतरण करते हैं। जैसे भगवान विष्णु सारे लोकों का पालन-पोषण करते हैं वैसे ही साधक अपने समाज और संस्कृति का रक्षण करे। यह भी ‘कावर’ का एक अर्थ अनुवर्तनीय है।
11. ‘क’ का एक अर्थ ‘यम’ यानि मृत्युदेवता भी होता है और ‘आ’ का अर्थ पूरा, ‘वर’ का अर्थ है पति, अर्थात् ‘कावर’ महाकाल का रूप है। ‘कावर’ साक्षात् शिव का रूप है जो हमें जन्म-मरण के चक्र से छुड़ाकर, अमृतपथ पर अग्रसर करता है।
12. ‘क’ का एक अर्थ ‘शब्द’ भी होता है तथा आवर का अर्थ होता है उसका अनुसंधान अर्थात् हम शब्दतत्त्व उपनिषद् के अर्थ का अनुसंधान करते हैं। उपनिषदों के श्रवण-मनन-निदिध्यासन के द्वारा ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार करना भी ‘कावर’ का एक अर्थ मनीषियों के लिये विचारणीय है।