शिव स्तुति

नमः शिवाय
रविजयमविजयमविजयपादम् पुरजितमरजितमरजितलोकम्।
असुरतरसुरतरसुरतनौकां प्रणमतिरणमतिरणमतिमन्दः॥

श्रीकण्ठकण्ठसितभासितनीलराशिः मन्दारदारुसुमनालिसुरागरावः।
हेरम्बलालनपरायणलोचनो यो शन्संहरो भवतु भस्मधरो भुजंगी॥

महेशं हर्षशैलान्तं सन्मुखं दृष्टिगोचरम्।
साक्षात् शिवं शिवंवन्दे नमश्शिवायरूपिणम्॥
आत्म-ज्ञान की साधना में उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वैदिक काल से ही सनातन-धर्मी ऐसे प्रतीक की उपासना करते रहे हैं जिससे परमात्मा अति शीघ्र अवगत हो सके। इसलिए शैवों में निराकार उपासना मे लिंग-पूजा प्रचलित हुई। सभी जीव परमात्मा के लिंग हैं, अतः उनका विशेष सम्मान भी परमात्मा की ही पूजा है। स्थूल-दृष्टि होने से प्राणियों के अन्दर वैसा भाव नहीं रहता। वैदिकों ने उस भाव को स्थापित करने के लिये शिव-पूजा प्रारम्भ की और यह शिव-पूजा धीरे-धीरे सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हो गयी। प्राचीन अवशेषों का उत्खनन इसका प्रबल प्रमाण है। शिव पूजा के साथ ही रुद्र-मूर्ति के मंत्रों का आवर्तन भी अनिवार्य कर दिया गया। आवर्तनपूर्वक अर्थविचार जिज्ञासुओं को अंतिम ध्येय तक पहुँचाने में सफल रहा।
अब रही आवश्यकता एक ऐसे मंत्र की जिसको सामान्य-दीक्षित या अदीक्षित जन, स्मृति में रखकर सरलता से आवर्तन करते हुए अर्थ का विचार करके लक्ष्य पा सकें। सबके लिए सम्पूर्ण वेद का अध्ययन संभव नहीं था, अतः ॠषियों ने ‘पञ्चाक्षरी विद्या’ का अनुसंधान किया। यह पञ्चाक्षरी विद्या साक्षात् ‘ब्रह्म-विद्या’ ही है। पाँच-अक्षरों में सम्पूर्ण मंत्रों और वैदिक सूक्तों को वेद भगवान ने सारगर्भित कर दिया। त्रयी के मध्य भाग में है यजुर्वेद, ‘ॠग्-यजु-साम’ इस क्रम से। चाहे वह कृष्णयजुर्वेद हो या शुक्ल-यजुर्वेद, दोनों में ही शतरुद्रीय उपलब्ध है जिसमें भगवान रुद्र, जो शिव का ही नाम है, के अनन्तरूपता का प्रतिपादन किया गया है। शतरुद्रीय के मध्य में है नमकाध्याय (पंचमाध्याय), और इसके मध्य में है ‘नमः शिवाय’ महामंत्र। पाँच अक्षरों का सामुदायिक रूप ही पंचाक्षरी मंत्र कहलाता है। सम्पूर्ण वेद का यह हृदयरत्न है। ऐसे तो मनीषियों ने ‘शिवतराय’ को भी महापंचाक्षरी मंत्र स्वीकार किया है।

‘नमः शिवाय’ अत्यंत रहस्यमय मंत्र है। सारे मांत्रिक वाङ्मय में यही एक ऐसा मंत्र है, जिसमें प्रणव (ॐकार) के प्रयोग की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह स्वयं प्रणवमय है। इतर जितने मंत्र हैं, वे प्रणवहीन होने पर अधूरे माने जाते हैं। यथा द्वादशाक्षर मंत्र में से आप ॐकार निकाल देवें, तो वह एकादशाक्षर ही रहेगा। ऐसे ही और मंत्रों के सम्बंध में भी समझना चाहिये। ॐकार प्रयोग पर यह षडक्षर मंत्र कहलाता है। वस्तुतः ‘नमः शिवाय’ प्रणव का ही विवर्ण रूप है। भगवान सदाशिव के मुखों से सर्वप्रथम यह प्रणव ही प्रकट हुआ –“ॐकारो मन्मुखात् जज्ञे प्रथमं मत्प्रबोधकः”। यह ॐकार स्वयं शिव से उत्पन्न होने कारण शिव ही है। शिव और ॐकार में कोई भेद नहीं है। भगवान शंकर स्वयं अपने दोनों शिष्यों – ब्रह्मा और विष्णु को ‘पञ्चाक्षरी विद्या’ का रहस्य इस प्रकार बतलाते हैं – “हमारे पाँच मुख हैं। पाँचों मुखों में पाँच प्रकार की शक्तियाँ हैं – सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह्। पाँच मुखों से ही पञ्च-तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) उत्पन्न हुए। इन पाँच तत्वों में भी पाँच शक्तियाँ निहित हैं। पाँच मुखों से क्रम से अकार, उकार, मकार, नाद और बिन्दु उत्पन्न हुए और सब संयुक्त होकर बना – ‘ॐ’। यह ॐकार ही ‘नमः शिवाय’ रूप में प्रकट हुआ। अकार से ‘न’ उकार से ‘मः’, मकार से ‘शि’ नाद से ‘वा’ और बिन्दु से ‘य’ प्रकट हुआ है। ‘नमः शिवाय’ में भी पाँचों शक्तियाँ सन्निहित हैं।
अस्मात् पंचाक्षरं जज्ञे बोधकं सकलस्य तत्।
अकारादि क्रमेणैव नकारादि यथा क्रमम्॥
इस पंचाक्षरी मंत्र से ही सम्पूर्ण वेद प्रकट हुआ और स्वयं को भी वेद में प्रकट कर दिया इस ‘पञ्चाक्षरी विद्या’ ने। इस पञ्चाक्षरी जप से ही सारी सिद्धियाँ और ज्ञान उपलब्ध हो जाता है। शिव वचन है – “पञ्चाक्षरी जपेनैव सर्वसिद्धिं लभेन्नरः”। ॐकार युक्त पञ्चाक्षरी जप में भी कोई हानि नहीं है। भगवान शंकर के अनन्त नाम और अनन्त मंत्र हैं पर शुद्ध स्वरूप को दर्शाने में ‘नमः शिवाय’ जैसा सक्षम अन्य कोई नहीं है। आचार्य पुष्पदन्त भी अपने जगत्प्रसिद्ध स्तोत्र में कहते हैं – हे परमेश्वर शंकर! आप ही जगत की सृष्टि के लिये रजोगुणी मूर्ति धारण करके ‘भव’ कहलाते हैं। आप ही संहरण लीला के लिये तमोगुण मूर्ति होकर ‘हर’ कहलाते हैं। और आप ही सारे प्राणियों को आनन्द देने के लिये व उनका भरण-पोषण करने के लिये सत्वप्रधान मूर्ति ‘मृड’ बन जाते हैं। आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। तीनों गुणों से शून्य, माया रहित, शुद्ध, परम तेजोमय ‘शिव’ को मेरा बार-बार प्रणाम है।
बहुलरजसे विश्वोत्पतौ भवाय नमो नमः
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः।
जनसुखकृते सत्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः॥
यहाँ भी ‘नमः शिवाय’ परम शिव के शुद्ध स्वरूप का ही प्रतिपादन कर रहा है। वस्तुतः ‘शिव’ का अर्थ ही ‘कल्याणकारी’ होता है और परम कल्याण है—अपने स्वरूप में स्थित होना। माया से रहित शिव ही हमें शुद्ध रूप को दर्शाने में सक्षम है। भगवान शंकर के तो सब प्रकार के रूप हैं जो शतरुद्रीय में संकेतित हैं पर साधक के लिये तो यह ‘शिव’ रूप अत्यंत उपादेय है। ‘शिव’ शब्द की व्याख्या करते हुये आचार्य भास्कर कहते हैं – हे भगवन्! यह शिकार और वकार परम पद की प्राप्ति के लिये दो पंख के समान हैं। ये दोनों संसार-समुद्र के दो तट हैं। शिकार और वकार आत्मज्ञान के अंकुर हैं। श्रुतियों के अत्यंत गोपनीय रहस्यों को प्रकट करने वाले ये दो गुप्तचर हैं और प्राणियों के जन्म-मरण रूप भ्रमण के बीज रूपी अज्ञान को पीसने-नष्ट करने वाले ये चक्की के दो पाट हैं, दो शिलायें हैं-
शिवेति द्वौ वर्णौ परपदपतद्धंस गुरुतौ तटौ संसाराब्धेः स्वविषयकबोधांकुरदले|
श्रुतेरन्तर्गोपायिततररहस्यब्रुवचरौघरट्टग्रावाणौ भवविटपि बीजौघदलने||
‘शिव’ नाम के माध्यम से ही मुक्ति प्राप्त होती है अतः ये दोनो पंख के समान कहे गये हैं।
भगवान शंकर को न जानने से संसार का प्रादुर्भाव और जानने पर संसार का लय होता है। इसका आदि और अन्त भी सदाशिव से ही होता है। आत्मज्ञान रूपी बीज के अंकुरित होते ही सम्पूर्ण भव शिवमय भासित होने लगता है। “तस्मात् सर्वप्रपञ्चोSयं ब्रह्मणोSन्यन्न चेतरत्”। वेद ने जिसे परम तत्व प्रतिपादित किया है उसे ‘शिव’ नाम प्रकट कर देता है और अज्ञान को यह पीसकर नष्ट कर देता है। ऐसे ‘शिव’ को हमारा बार-बार प्रणाम है। शिव नाम की महिमा का प्रतिपादन तो स्वयं वेद भगवान करते हैं। स्मृतियों और पुराणों में भी इसकी प्रचुर प्रशंसा मिलती है। शिव-रहस्य का वचन है –
सर्वाणि शिवनामानि मोक्षदान्येव सर्वदा।
तेष्वप्युतमं नाम शिवेति ब्रह्म संज्ञितम्॥
शिवेति नाम विमलं येनोच्चारितमादरात्।
तेन भूयो न संसारसागरं समवाप्यते॥
यानि भगवान शंकर के जितने नाम हैं वे सब सदा मोक्षदायक हैं लेकिन उन अनन्त नामों में ‘शिव’ नाम अत्यंत उत्तम है। ‘शिव’ यह सारे माया-मलों से रहित नाम एक बार जिसने ले लिया वह इस भवसागर को अतिशीघ्र पार कर जाता है।

शिव-शतनाम की व्याख्या करने वाला आलबाल भी ‘शिव’ शब्द की कई व्युत्पत्तियाँ उपस्थित करता है। स्वभावतः निर्मल होने के कारण, कल्याण गुणवाले होने के कारण, अत्यन्त शान्त होने से, जगत का आधार होने के कारण, भजन करने वालों को अमृत-प्रदान करने से और इच्छाशक्ति के आश्रय होने से आप ‘शिव’ कहे जाते हैं –
प्रकृत्या नैर्मल्यादमलगुणयोगादपि शमात्
जगत्याधारत्वात् भजदमृतदानाच्च भवतः|
बलादिच्छाशक्तेः प्रथितपुरि भद्रश्रव इति
प्रतीतस्त्वंलिंगे त्रिपुरहर!तस्मादसि शिवः||
‘श्याति अशुभं’ इस व्युत्पत्ति से भी ‘शिव’ उत्पन्न होता है जिसका अर्थ है सारे अशुभों को दूर करने वाला। ‘वष्टीति शिवः’ इस प्रकार भी वर्ण को उलट देने से शिव शब्द संपन्न होता है। कहा भी है –“हिंसि धातोः सिंहशब्दो वशकान्तौ शिवः स्मृतः”। श्वेताश्वतरोपनिषद् भी शिव शब्द की व्याख्या व्यापक अर्थ में ही करता है—“सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः। सर्वव्यापी स भगवान् तस्मात् सर्वगतः शिवः”
वह सबके अन्दर अभिन्ननिमित्तोपादान होकर अनुस्यूत है इसलिये उसे शिव कहते हैं। उपनिषद् ब्रह्मयोगी ‘शिव’ शब्द की व्याख्या यों करते हैं—“स्वातिरिक्ताविद्यापदाशिवापह्णवसिद्धो वा शिवो भवति|”
अपने से अतिरिक्त अविद्या, जो अशिवता को उत्पन्न करने वाली है, उसका निराकरण करने के कारण वे ‘शिव’ कहे जाते हैं। परमशिव का वर्णन करते हुये ‘प्रयोगसार’ कहता है –
नित्यः सर्वगतः सूक्ष्मः सदानन्दो निरामयः|
विकाररहितः साक्षी शिवो ज्ञेयः सनातनः||
जो नित्य है, सर्वगत है, सूक्ष्म है, सदानन्द है, सम्पूर्ण रोगों से रहित है, सारे विकारों से विहीन है, सनातन है, उसे ‘शिव’ जानना चाहिये। ऐसे ‘शिव’ को कवि कुलभूषण महाकवि जगद्धर भट्ट भी स्तुतिकुसुमाञ्जलि में प्रणाम करते हैं—
नमः शिवाय निःशेषक्लेशप्रशमशालिने।
त्रिगुणग्रन्थिदुर्भेदभवभेदविमोहिने॥
सम्पूर्ण क्लेशों का नाश करने वाले, त्रिगुणग्रन्थि का भेदन करने वाले ‘शिव’ को मेरा नमस्कार है। यहाँ कवि ने बड़ी ही दक्षता के साथ ‘पञ्चाक्षरी विद्या’ का महत्व भी प्रतिपादित कर दिया है। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश; यही पाँच क्लेश हैं, और ‘नमः शिवाय’ भी पाँच ही अक्षर वाला है। इस तरह एक-एक को नष्ट करने के लिये एक-एक ही काफी है। पाँच के द्वारा पाँचों निहित होकर स्वरूप अवशेष रह जाता है और जो अंत में बचा रहता है उसे ही ‘शिव’ कहते हैं। ऐसे शिव से भक्त प्रार्थना करता है कि भगवन्! जो आपके आगे ‘रव’ (ध्वनि) करता है उसे आप ‘वर’ दे देते हैं, जो आप से ‘मद’ करता है उसे आप ‘दम’ (दण्ड) दे देते हैं। आप इन दो शब्दों को तो उलटने में बड़े कुशल हैं पर क्या कारण है कि मैं कब से ‘नमः’ ‘नमः’ कर रहा हूँ पर आप थोड़ा भी अपना ‘मन’ मेरी तरफ नहीं करते।
यस्ते ददाति रवमस्य वरं ददासि, यो वा मदं वहति तस्य दमं विधत्से|
इत्यक्षरद्वयविपर्ययकेलिशीलः किं नाम कुर्वति नमो न मनः करोषि||
सूत संहिता भी शिव की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए बताती है कि शिव काल से अपरिच्छिन्न हैं—
कालो माया च तत्कार्यं शिवेनैवाSवृतं बुधाः|
शिवः कालानवच्छिन्नः कालतत्वं यथा तथा||
शिव की देश-काल से परे की स्थिति का वर्णन स्वयं उपनिषद् करते हैं और वही शिव अनन्त मूर्तियों में प्रकट होते हैं। विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, अग्नि आदि मूर्तियों से प्रतिपाद्य एकमात्र शिव ही हैं। उसी शिव के साक्षात्कार के लिये है पञ्चाक्षरी ब्रह्मविद्या – ‘नमः शिवाय’।

सकाम और निष्काम दोनों प्रकार से इस मंत्र का अनुष्ठान किया जाता है। सकामी मंत्र की सिद्धि द्वारा देवत्व, इन्द्रत्व, कुबेरत्व प्राप्त करता है और ज्ञानसाधक मंत्रार्थ का विचार कर आत्मस्थिति को। अतः दोनों प्रकार के साधकों के लिये पञ्चाक्षर मंत्र का विधि-विधान संक्षेप से प्रकट किया जाता है। सर्वप्रथम स्नानादि कृत्यों से निवृत्त होकर भगवान सदाशिव का पञ्चोपचार या षोड्शोपचार से पूजन करे। उतम देश-तीर्थ, देवालय, वन या एकान्त पवित्र स्थल का चयन करे और साधना के लिये अन्य उपकरण एकत्रित कर लेवें जैसे– आसन, माला, भस्मादि। गुरुमुख से विधिवत् मंत्र ग्रहण करके एकाग्रतापूर्वक आज्ञा लेकर मंत्र जप प्रारम्भ करना चाहिये। प्रतिदिन तीन बार भस्म स्नान करे, नहीं तो समंत्र भस्म धारण करे। फलाहार या हविष्यान्न ग्रहण करे। पूर्व या उत्तर की तरफ मुख करके तीन बार प्राणायाम करे। ॠषि, छन्द, देवता, शक्ति और बीज का स्मरण कर मंत्र का करन्यास और अंगन्यास करके गुरुस्मरण-पूर्वक, इष्टदेव सदाशिव का अपने हृदयकमल में ध्यान करे। तीन मण्डल- सूर्य, चन्द्र और अग्नि; इनके मध्य में विद्युतरेखा की तरह अत्यंत दीप्त परम ज्योतिस्वरूप ’शिव’ का ध्यान करते हुये पाँच लाख तक जप करना चाहिये। जो षडक्षर (प्रणवयुक्त) करते हैं उनके लिये छः लाख जप और हवन और तर्पण के लिये एक-एक लाख जप करना चाहिये। आहुति घी, दूध या पलाश के फूलों से करनी चाहिये। तब यह मंत्र सिद्ध होकर भोग-मोक्ष प्रदान करता है। अथवा उपनिषदों में नृत्य करते हुये नटराज मूर्ति का ध्यान भी साधक के लिये हितकारी है। अपने सहज परिच्छिन्न भाव को निवृत्त करके–‘मैं ही शिव हूँ’ (शिवोSहम्) ऐसा विचार करते हुये मंत्र की सिद्धि करनी चाहिये।

ॐ नमः शिवाय। ॐ अस्य श्रीशिवपञ्चाक्षरमन्त्रस्य वामदेव ॠषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्री सदाशिवो देवता, ओंकारो बीजम्, नमः शक्तिः, शिवाय इति कीलकम्, मम श्रीसाम्बसदाशिव-प्रीत्यर्थं न्यासे जपे च विनियोगः। इस विनियोग से अपने अंगो का न्यास करे।
ॠष्यादिन्यास –
• ॐ वामदेवर्षये नमः, शिरसि।
• ॐ अनुष्टुप्छन्दसे नमः, मुखे।
• ॐ श्रीसदाशिवदेवतायै नमः, हृदि।
• ॐ बीजाय नमः, गुह्ये।
• ॐ शक्तये नमः, पादयोः।
• ॐ शिवाय कीलकाय नमः, सर्वांगे।
• ॐ नं तत्पुरूषाय नमः, हृदये।
• ॐ मं अघोराय नमः, पादयोः।
• ॐ शिं सद्योजाताय नमः, गुह्ये।
• ॐ वा वामदेवाय नमः, मूर्ध्नि।
• ॐ यं ईशानाय नमः, मुखे।
करन्यास –
• ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः।
• ॐ नं तर्जनीभ्यां नमः।
• ॐ मं मध्यमाभ्यां नमः।
• ॐ शिं अनामिकाभ्यां नमः।
• ॐ वां कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
• ॐ यं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
षडंगन्यास –
• ॐ हृदयाय नमः।
• ॐ नं शिरसे स्वाहा।
• ॐ मं शिखायै वषट्।
• ॐ शिं कवचाय हुम्।
• ॐ वां नेत्रत्रयाय वौषट्।
• ॐ यं अस्त्राय फट्।
इस प्रकार न्यास करके परमशिव का एकाग्र मन से ध्यान करते हुए अर्थपूर्वक ‘नमः शिवाय’ मंत्र का जप करना चाहिये। जप में उपांशु ज्यादा उपयोगी है। चित में व्याग्रता पुरश्चरण को पूर्ण नहीं होने देती। परमशिव के प्रति भक्तिभाव और समर्पण ही इसका समाधान है। अर्थ-पूर्वक जप साधक को सर्वसिद्धियाँ प्रदान करता हुआ परम स्थिति तक ले जाता है। सूत संहिता स्वयं ‘नमः शिवाय’ का अर्थ यज्ञवैभवखण्ड के आठवें अध्याय में करती है—
सत्यज्ञानपरानन्दस्वरूपस्य शिवस्यतु। असंपृक्त्या शिवस्यायं शिवशब्दस्तु वाचकः॥8॥
नमः शब्दो नमस्कारवाचकः परिकीर्तितः। प्रह्वतालक्षणः प्रोक्तो नमस्कारः पुरातनैः॥9॥
प्रह्वता नाम जीवस्य शिवात्सत्यादिलक्षणात्। भेदेन भासमानस्य मायया न स्वरूपतः॥10॥
संबंध एव तेनैव सोSपि तादाम्यलक्षणः।नित्यसिद्धः शिवः साक्षात्स्वरूपतः सर्वदेहिनाम्॥11॥

सत्य, ज्ञान और परमानन्दरूप शिव को शक्तिवृत्ति से स्पर्श किये बिना ही ‘शिव’ शब्दवाचक बताया गया है। नमस्कार प्रह्वता को कहते हैं। सत्यादि स्वरूप शिव से जीव का तादाम्य, अभेद ही प्रह्वता है। यद्यपि जीव शिव से भिन्न प्रतीत होता है तथापि वह प्रतीति केवल मायिक है, वास्तविक भेद नहीं है। वस्तुतस्तु शिव सब देहधारियों का नित्यसिद्ध अपरोक्ष स्वरूप हैं। मंत्रराज का दूसरा भाव सूतसंहिता यों अभिव्यक्त करती है –
तस्माद् बुभुत्सोर्जीवस्य नोपादेयं हितं सदा। न हेयमहितं तद्वद्वस्तुतो न प्रतीतितः॥12॥
एवं विद्यान्नकारार्थं मकारार्थं उदीर्यते । मकारो मम शब्दार्थों लुप्तस्तवेको मकारकः॥13॥
व्यावहारिकदृष्ट्याSयं नमस्कारः प्रकीर्त्यते।तस्माच्चतुर्थी शब्दस्तु प्रोच्यते नहि वस्तुतः ॥14॥
‘न’ शब्द का अर्थ है कि जिज्ञासु जीव के लिये हमेशा ही परमार्थतः न कुछ ग्राह्य हित है और न ही कुछ त्याज्य अहित। वे प्रतीति विशेष होने से ही वास्तविक नहीं, बल्कि मिथ्या हैं। ‘म’ शब्द यहाँ मम (मेरा) शब्द के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। एक मकार का छान्दस प्रकिया से अदर्शन हो गया है। क्योंकि नकार संगत एक मकार का प्रयोग प्रमाण के अर्थ में करना शिष्ट व्यवहार है, इसलिये यहाँ भी उसका नमस्कार अर्थ मानकर ‘शिव’ शब्द का व्याकरणानुकूल चतुर्थी विभक्त्यन्त प्रयोग कर दिया है। वस्तुतः यहाँ प्रणामार्थक ‘नमः’ शब्द विवक्षित नहीं है, ‘न मम’ यही विवक्षित है। मुझ सहित सभी कुछ शिव है, अतः मैं और मेरा कुछ भी नहीं है। वेद, पुराण, स्मृतियाँ, महाभारत, अन्यशास्त्र,तर्क, शैवागम, वैष्णवागम, अन्य आगम तथा विद्वानों का अनुभव इस स्वसंवेद्य शिवरूप अर्थ में ही समाप्त होता है, अन्यत्र कही नहीं। ‘नमः शिवायः’ मंत्र से ही सम्पूर्ण शास्त्र और प्रपञ्च का उद्भव और विलय है।
वेदान्त-विचार के प्रवीण मनीषियों ने तो ‘पंचाक्षर मंत्र’ से ही ‘पञ्चीकरण’ का अविष्कार करके ब्रह्म-बोध प्राप्त कर लिया। ‘नमः शिवायः’ से ही पाँचों भूत, स्थूल-सूक्ष्म शरीर की उत्पत्ति तथा उनका अधिष्ठान; इन सबका ज्ञान जिज्ञासु कर लेते हैं। भगवान सुरेश्वराचार्य कृत ‘पञ्चीकरण’ इसके लिये अवश्य द्रष्टव्य है। सम्पूर्ण प्रपञ्च का विलय भी पञ्चाक्षरी में ही इष्ट है। ‘प्रणव’ मंत्र की दीक्षा का विचार जहाँ सूतसंहिता करती है वहीं पर उससे परमब्रह्म तक कैसे पहुचाँ जाता है इसका प्रतिपादन है।
योग का साधक भी ‘पञ्चाक्षरी विद्या’ के द्वारा कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करके चक्रों का भेदन कर सहस्रार में विलसित शिव का साक्षात्कार कर लेता है। प्रक्रिया में शिव अपनी शक्ति का आश्रय लेकर ही अभिव्यक्त होते हैं। शिव और शक्ति अलग-अलग लगते हुये भी अलग-अलग नहीं हैं। इस तत्व का सविस्तार वर्णन महाराज ज्ञानेश्वर ने अपने ग्रन्थों में किया है। ‘पञ्चाक्षरी विद्या’ तो ऐसी है कि इसमें सबका अधिकार है पर परम्परा से अवश्य अपनी पद्धति को ग्रहण करना चाहिये क्योंकि अगुरुपूर्वक मंत्र अपना फल प्रदान करने में समर्थ नहीं होता है । मंत्र के रहस्यार्थ का प्रकटीकरण तो मंत्र का सुयोग्य वेत्ता आचार्य ही कर सकता है क्योंकि पञ्चाक्षर मंत्र अत्यंत रहस्यपूर्ण मंत्र है। यह भले ही सर्व सुलभ हो गया है पर रहस्य अभी भी सद्गुरुओं के पास ही है। नमः शिवाय’ की विस्तृत व्याख्या आचार्य शंकर के प्रमुख शिष्य भगवत्पादीय पद्मपादाचार्य ने की है। जिसकी बहुत ही सुन्दर अनुवादात्मक व्याख्या हमारे ‘सद् गुरुदेव’ महाराज जी ने वर्षों पहले साधकों के लिये प्रकट की। उसे ही मैं उनके अनुग्रह से शीर्षकपूर्वक प्रस्तुत कर रहा हूँ। अधिक व्याख्यान की यहाँ आवश्यकता न होने से उसे यथावत् ही रहने देते हैं –

1) नमः शिवाय : त्याग द्वारा आनन्द
त्यागो हि नमसो वाच्य आनन्दः प्रकृतेस्तथा।
फलं प्रत्ययवाच्यं स्यात् त्याज्यं पत्रफलादिकम्॥1॥

नमः शब्द का अर्थ वेदों में त्याग है। शिवाय शब्द में शिव का अर्थ आनन्द, एवं प्रत्यय आय का अर्थ फल है। जैसे साधारण पूजा में फूल-पत्ते आदि चढ़ाते हैं वैसे ही मैं इस सारे ‘इदं’ रूप से प्रतीयमान अर्थात् दृश्य जगत् का त्याग आनन्द की प्राप्ति के लिये करता हूँ। सालोक्य, सामीप्य, सायुज्य और सार्ष्टि रूप से चारों प्रकार के आनन्द की सिद्धि हो, ऐसा यहां भाव है।
2) नमः शिवाय : प्रणाम, समर्पण, शिवसेवा
त्यजामीदमिदं सर्वं चतुर्णामिह सिद्धये।
अथवा नमसो वाच्यः प्रणामो दैन्यलब्धये ॥2॥
दैन्यं सेवा तया ज्ञप्तिः सिद्धिः सर्वस्य वस्तुनः।
नमामि देवदेवेशं सकामोSकाम एव वा ॥3॥
नमः का प्रसिद्ध अर्थ प्रणाम है। मैं दीन भाव की प्राप्ति के लिये सकाम या निष्काम भाव से विष्णु आदि देवदेवों के भी ईश्वर शिव के लिये प्रणाम समर्पण करता हूँ। दीनता का अर्थ सेवा है। अतः आपकी सेवा या भक्ति करने का अवसर मुझे मिले। शिव की सेवा से ही आत्मज्ञान एवं समग्र पदार्थों की प्राप्ति तथा ऐश्वर्यों की सिद्धि हो जाती है। भाव यह है कि सकाम होकर शिव को प्रणाम करने से सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा निष्काम को ज्ञान द्वारा आत्मस्थिति प्राप्त होती है।
3) नमः शिवाय : अभिमान का नाश
नञा निषिध्यते भावविकृतिर्जगदात्मनः।
मसनं देवदेवेशं नेह नानास्ति शब्दतः ॥4॥
अयेति गमयेत्यर्थे तस्माछुद्धोस्मि नित्यशः।
प्रणामो देहगेहादेर् अभिमानस्य नाशनम् ॥5॥
आत्मा का मसन अर्थात परिणाम जगत् है, ऐसा आत्मा से जगत् की उत्पत्ति बताने वाली श्रुतियों से प्रतीत होता है। यह परिणाम जन्म, सत्ता, बदलना, बढ़ना, घटना व नाश होना; इस प्रकार के भेदों से छः प्रकार का है। अतः मः का अर्थ है परिणामी। इन सभी परिणामों का ‘न’ से निषेध है, अतः वे परमशिव देवदेवेश ही ‘नमः’ हैं। यहाँ सम्बोधन में ‘हे नमः’ अर्थात हे अपरिणामी देवदेवेश यह अर्थ है। इस निषेध में ‘नेह नानास्ति’ यह वेदवाक्य ही प्रमाण है। भाव है कि जैसे वेदों ने उत्पत्ति बताई, वैसे ही वास्तविक उत्पत्ति का निषेध भी किया है। हे शिव आप मुझे इस अपरिणामी आत्मतत्व को प्राप्त करावें। तभी ‘मैं नित्य शुद्ध हूँ’ इस प्रकार का भावरूप प्रणाम कर सकूंगा और इससे मेरा शरीर, प्राण, इन्द्रियां, मन, बुद्धि आदि में अहंता और घर, पत्नी, पुत्र आदि में ममता रूपी अभिमान नष्ट होने का फल पैदा होगा। इस अभिमान का नाश ही वास्तविक प्रणाम है। नमः ! शिव! अय = अपरिणामी! कल्याण स्वरुप! (मुझे भी वहीं) ले जाओ।
4) नमः शिवाय : शिव और जीव एक
शिवो ब्रह्मादिरूपस्स्याच्छक्तिभिस्तिसृभिस्सह।
अथवा तुर्यमेवस्यान् निर्गुणम्ब्रह्मतत्परम्॥6॥
नंमसो नमने शक्तिर् नमनं ध्यानमेव च।
ङेSन्तातादात्म्यसम्बन्धः कथ्यते प्रत्यगात्मनोः॥7॥
अहं शिवः शिवोहं च मन्ये वेदान्तनिष्ठया।
इत्येवं नम इत्युक्तं वेदैः शास्त्रैश्च सर्वशः॥8॥
इच्छा, ज्ञान व क्रिया शक्तियों के द्वारा शिव ही ब्रह्मा, विष्णु तथा शंभु रूप धारण करते हैं। इन तीन शक्तियों के लीन होने पर वे तुरीया अवस्था में निर्गुण परब्रह्म ही हैं। नमः का अर्थ नमन अर्थात् ध्यान है। चतुर्थी ‘ङे’ अर्थात् आय अर्थ एकता के सम्बन्ध में है। अर्थात् शिव व प्रत्यगात्मा में तादात्मय सम्बन्ध है। शक्तियों में भेद होने पर भी शक्तिमान शिव में अभेद है। जीव की जाग्रत, स्वप्न व सुषुप्ति अवस्थाओं से शून्य दशा में तथा शिव की निर्गुण दशा में कोई भेद नहीं है। अतः ‘मैं शिव हूँ’ इस प्रकार वेदान्त-निष्ठा से मानता हूँ। वेदों तथा शास्त्रों द्वारा सब प्रकार से इस अभेद भाव को ही ‘नमः’ कहा गया है। भाव है कि निर्गुण शिव से एकता का ध्यान करना ही मंत्रार्थ है।
5) नमः शिवाय : शिव दासता
अथवा दास एवाहं अहं दास इतीरणम्।
इत्येव नम इत्युक्तं वेदैः शास्त्रैश्च सर्वशः॥9॥
शिव तीनों शक्तियों से युक्त हैं, अतः मैं अपने आप को उनके समर्पण करता हूँ। इसलिये मैं दास हूँ, दास ही मैं हूं, इस प्रकार का पुनः पुनः कथन और विचार भी वेदों तथा शास्त्रों में नमः का अर्थ प्रतिपदित करता है। शिव के लिये ही मैं दास हूँ इस भाव से देह आदि तथा पत्नी, राज्य आदि की दासता निवृत्त होकर शिव कृपा से शिवभाव की प्राप्ति हो जाती है।
6) नमः शिवाय : परमपुरुषार्थप्राप्ति
अथवेदमिदं सर्वं त्यजामि परमाप्तये।
अर्थं धर्म च कामं च वाञ्छँश्च जगदीश्वरम्॥10॥
एतन्मन्त्रार्थतत्वज्ञैर् वेदवेदान्ततत्परैः।
निर्णीतं तत्वगर्भं यद् विज्ञेयं मुक्तिलब्धये॥11॥
परम अवस्था अर्थात तुरीयावस्था की प्राप्तिके लिये इदंता से प्रतीयमान यह सब छोड़ता हूँ अर्थात
उनमें अपना अपना अभिमान हटाता हूँ अर्थात जगदीश्वर को चाहने से अर्थ, धर्म, और काम सभी को छोडता हूँ। इससे कर्म संन्यास रुप एषणात्यागात्मक श्रीपरमहंस अवस्था को बताया गया है। वेद व वेद के सिद्धांत में तत्पर मंत्रराज के अर्थ के रहस्यों के ज्ञाताओं ने इसी त्रिविध पुरूषार्थ के त्याग से परमपुरूषार्थ की प्राप्ति में इस मंत्र का तत्व छिपा रखा है। उसको मुक्ति के लाभ के लिये जानना चाहिये। अतः परमहंस संन्यास के द्वारा शिव तत्व की इच्छा करता हुआ सर्वस्व त्याग करता हूँ, यह मंत्रार्थ है। इसी अर्थ को पूर्वाचार्यों द्वारा सम्प्रदायसिद्ध कह कर शंकर भगवत्पाद द्वारा स्वीकृत बता रहे हैं। अतः इस अर्थ को मुख्य बताया जा रहा है। इस प्रकार विषय, साधन, साध्य, फल आदि समग्र वेदान्त रहस्य इस मंत्र में प्रतिपादित है।

7) नमः शिवाय : तत्व-ध्यान
अथवा मुक्तिलाभाय ध्येयं तत्वं विवेकतः।
भिन्नं बुद्धा हृदा देवं मन्त्रेणेशं जगद् गुरुम्॥12॥

शिव या कल्याण मुक्ति को पाना ही है। नमः का अर्थ ध्यान है। अतः मुक्ति की प्राप्ति के लिये तत्व का ध्यान करना चाहिये, ऐसा इस मंत्र का अर्थ है। जीव या पुरूष को मन या प्रकृति से विवेक द्वारा अलग करके समझना एवं साक्षी रूप से अपने को जानना ही ध्यान है। हृदय या बुद्धि से जगद्गुरु ईश्वर देव को माया व तत्कार्य से भिन्न समझना द्वैत दर्शन में है पर प्रारंभिक साधन में इसकी सहायता लेकर मंत्र का जप कर सकते हैं। यहाँ पाशनिवृति के लिये पशुपति का ध्यान पशु करता है। शिव शब्द की ध्वनि से पशुपति की प्रसन्नता के लिए अर्थ उपलब्ध हो जाता है।
8) नमः शिवाय : जीवभाव संहरण
नमेरचि नमः प्रोक्तो जन्ता स्याज्जगदीश्वरे।
तस्माद्दासोहमित्येवं मत्त्वा मां प्रापयात्मनि॥13॥

नम् में अच् जोड़ने से बने नमः शब्द का अर्थ नमस्कार करने वाला साधक है। जगदीश्वर
को जन्ता अर्थात सर्वभक्षक कहा गया है। सर्व संहर्ता होने से शिव ही जन्ता हैं। अतः उनका भक्ष्य या भोग होने से मैं उनका दास हूँ। ऐसा मानकर मुझे आत्मा में पहुँचा दें अर्थात् आत्म स्थिति प्रदान करें। अधिष्ठान होने से ही वे सर्व संहारक हैं। अधिष्ठान ज्ञान से अध्यस्त ज्ञान की निवृत्ति सर्वत्र प्रसिद्ध है। आप मेरे जीव भाव का संहार करें। शिव! मैं नमः हूँ अतः दास जानकर परमात्म प्राप्ति करावें।

जगदीश्वर के होने पर ही, उनकी कृपा से ही, जीव भोक्ता होता है। उनकी कृपा से ही आत्मस्थिति होती है। अतः आपके दास भाव को स्वीकार करके प्रणाम करने वाले मुझ को आप भोग व मोक्ष प्रदान करें, यह भाव है।
9) नमः शिवाय : लक्ष्मी प्राप्ति
अस्मिञ्छेते जगत्सर्वं तन्मयं शब्दगामि यत्।
तद् वानाच् छिव इत्युक्तं कारणं ब्रह्म तत्पराः॥14॥
न मा यस्यास्ति लक्ष्मीश सोहं देवो न संशयः।
तस्मान् मे प्रापयेहैव लक्ष्मीं विद्यां सनातनीम्॥15॥
जो शब्द द्वारा जाना जाता है वह सम्पूर्ण जगत् शब्द का ही विकार है। ‘वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्’ ‘तस्योपव्याख्यानम्’ आदि वेदवाक्य इसमें प्रमाण हैं। वह सारा जगत् शिव में सोता है अर्थात शिव ही उसके अधिष्ठान हैं। इसलिये वे वन्दनीय या संभजनीय हैं। अथवा सारा नाम रूपात्मक प्रपंच प्रकृति में सोता है एवं उसको व्यक्त करने से वे शिव कहे गये हैं। (शेतेSस्मिन्निति शिं-माया। शिं वन्यति इति शिवः) शिव इस प्रकार अभिन्न निमित्तोपादन कारण हैं। तत्पराः का भाव है— हे शिवपरायण लोगों! आप ऐसा निश्चय करें। लक्ष्मी सनातन विद्या अर्थात वेदविद्या का नाम है। लक्ष्मीपति! जिसे यह लक्ष्मी प्राप्त नहीं है वह जीव रूप देव अर्थात् स्वयं प्रकाश आत्मा मैं हूँ। अर्थात् मै अज्ञानी जीव भाव में स्थित आत्मा हूँ। इसमें स्वानुभूति का प्रमाण होने से संशय नहीं है, अर्थात वेद व युक्ति से असिद्ध होने पर भी सत्य है। मुझे इस शरीर में रहते हुये ही उस अवस्था को प्राप्त करावें। तात्पर्य है कि हे शिव! मुझे शिव भाव प्राप्त करावें।
10) नमः शिवाय : आत्म-ज्ञान
यस्मादानन्दरूपस्त्वं देवैर् वेदैर् निगद्यसे।
तस्मान् मे देहि योगीश भद्रं ज्ञानं सुभावनम्॥16॥
चूंकि आप ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं द्वारा शिव अर्थात् आनन्द कहे गये हैं अतः हे योगीश्वर आप मुझे जो अज्ञान के कारण निरानन्द हूँ (नमः) उत्तम भाव वाला कल्याण्कारी ज्ञान अर्थात् आत्म ज्ञान दें। नमः को शिव के प्रति ले जावें।
11) नमः शिवाय : नेति नेति
यस्मात्त्वं नेतिनेतीति नञर्थं मासि वेदजम्।
तस्मान्नामोसि भद्रं मे यतो जातोSनमो नमः॥17॥
शिवं शिवमथाप्राप्तः शिवायेति निगद्यसे।
शिवाय मे तथा प्राप्त्या शिवायेति निगद्यसे॥18॥
चूंकि वेद से उत्पन्न नेति नेति में नञ् के अर्थ को आप माप लेते हैं अर्थात् सर्वतोभावेन जान लेते हैं अतः आप ‘नमः’ है। सर्वनिषेध्य, निषिद्ध एवं निषेधाधिष्ठान को जानने से शिव ‘नमः’ कहे गये हैं। (नं मासि इति नमः) चूंकि आपकी कृपा से अनमः मैं नमः बन गया अतः मेरा कल्याण हो गया है।
सकल उपद्रवों से रहित निरतिशय अखण्ड एकरस आनन्द स्वरुप शिव भाव को (आय) आप्राप्त अर्थात् पूर्णरूप से प्राप्त होने से महेश को शास्त्रों द्वारा ‘शिवाय’ नाम से कहा गया है। जिस प्रकार नामरूप का सर्वथा निषेध दो नकारों से है वैसे ही शिव का प्रतिपादन भी दो शिव शब्दों से है। पाठान्तर में ‘शिव शिवमथाप्राप्तः’ है। शिव भाव को पूर्णता से प्राप्त होने से सदाशिव शिवाय कहे गये हैं। सामान्यतः शवरूप को कल्याणकारी बनाने से जीव को भी शिव कहते हैं पर वे तो शिवाय हैं। हे शिवाय! मुझे भी वही अवस्था प्राप्त कराके सर्वदा शिवाय बनाओ, यह भाव है। इस अर्थ में दोनों सम्बोधन शब्दों द्वारा महेश को याद दिलाते हैं कि मुझे वैसा ही बनावें।
12) नमः शिवाय : प्रपञ्च की शिवरूपता
शिवां यातो महाभद्र नमोSहं मायया ध्रुवम्।
ततो नमाय मह्यं मः शिवायं कुरु सर्वथा॥19॥
हे महाकल्याणस्वरूप महादेव! आप शिवा अर्थात् ब्रह्मविद्या को (पतिभाव से) पा गये हैं। अर्थात् शिवा से आलिंगित ही शिव होते हैं। अतः आप शिवाय हैं। मैं माया से ‘नमः’ अर्थात् विद्याहीन हूँ। भाव है कि आप विद्याधीश्वर हैं एवं मैं विद्याशून्य हूँ। इसलिये मुझ नमः के लिये ‘मः’ इस विकारमय नामरूपमात्मक प्रपंच को सब तरह शिवाय रूप अर्थात् ब्रह्मरूप कर देवें।
‘मस्यत इति मः’ तात्पर्य है कि सारा देह गेहादि ब्रह्मरूप से भासमान होने लगे। अथवा कल्याणमय आप हैं एवं मैं कल्याण से रहित हूँ। अतः आप मुझे व मेरे लिये सभी पदार्थ या लोगों को कल्याणमय बना देवें। सकाम साधक शिवा से महाशक्ति, तथा निष्काम महाविद्या लेते हैं अतः यह अर्थभेद है। सकाम सर्वत्र कल्याण चाहता है, व निष्काम सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि।
13) नमः शिवाय : उभय आप हैं
शिवम् एषि यतो ज्ञप्त्या शिवायस् त्वं प्रपठय्से।
न ते माया यतो ज्ञप्त्या नमो वेदैः प्रपठय्से॥20॥
चूँकि आत्माकारवृत्ति रूप ज्ञान से शिवभाव को प्राप्त करते हो अर्थात् अविद्या को नष्ट करके आनन्द में स्थित होते हो, अतः वेदों में आप शिवाय कहे जाते हो। पूनः चूंकि ज्ञान से आप में माया नहीं है अतः वेदों के द्वारा नमः भी कहे जाते हो। अतः ज्ञानावस्था में मायाहीन निर्गुण भाव को मुझे भी प्राप्त करा दो यह भाव है। जिस उपाधि में शिव का ध्यान किया जाता है वही उपाधि अपने में प्रकट हो जाती है, इस सिद्धान्त के अनुसार इन दोनों सम्बोधनों से ज्ञानप्राप्ति की प्रार्थना है।
14) नमः शिवाय : मैं ही नमः मैं ही शिवाय
नमोहं च शिवायोहं नमो मह्यं नमो नमः।
नमो नमाय शुद्धाय मंगलाय नमो नमः॥21॥
नमो नमसनं शम्भो निराकाराय ते नमः।
निर्गुण निष्क्रियं शान्तं इत्याद्याश्श्रुतयो जगुः॥22॥
नमो ब्रह्म निराकारं शिवायं शिव सर्वदा।
अतोषं च न मा भद्र शिवायोहं न संशयः॥23॥
उपर्युक्त सभी अर्थों को संक्षेप में बताया जा रहा है। मैं नमः हूँ एवं मैं ही शिवाय हूँ। भाव है कि मंत्रराज की साधना करके मैं मायारहित शिव भाव को प्राप्त कर गया हूँ। ऐसे मेरे साक्षीरूप अहं को अपरोक्ष बता कर अपरोक्ष आत्मतत्त्व को ज्ञानीजन सदा नमस्कार करते हैं। अहं प्रत्यय में ही शिव का सर्वश्रेष्ठ प्रकाश होने से अहंग्रहोपासना की उत्तमता सर्वत्र वेदान्तों में प्रतिपादित है। पुनः नमः अर्थात् मायारहित शुद्ध मंगलरूप के प्रति शरीर-वाणी व मन से नमस्कार है। हे शंभु! हे नमः! चूंकि आप में कोई विकार नहीं होता अतः आपके निराकार रूप को नमन है। इसमें श्वेताश्वतर शाखा का आपको निर्गुण निष्क्रिय व शान्त बताने वाला मंत्र प्रमाण है। हे शिव! आप हमेशा नमः (माया, तत्कार्य व तदधिष्ठान को सब प्रकार से जानने वाले) हैं, सर्वव्यापक (ब्रह्म) हैं, आकारों से रहित हैं (निरवयव हैं) तथा शिवाय (शिवा से माधुर्य भाव में संश्लिष्ट) हैं, इस प्रकार आपकी अखण्ड व्यापक सत्ता में सबका समावेश होने से मैं भी भिन्न सत्ता वाला नहीं हो सकता। अतः आपसे शुद्ध रूप में अभिन्न होने से मैं भी नमः (परिणामरहित) तथा शिवाय (ब्रह्मविद्या को प्राप्त) हूँ। हे भद्र! आपकी कृपा से मैं ऐसा बन सका हूँ यह निश्चित है।
भस्मजाबालोपनिषद् कहती है – यह ‘पञ्चाक्षरी मंत्र’ ही तारक है। इसके जप से जीव तर जाता है। शिवरहस्य का वचन है –तारकं ब्रह्म परमं शिव इत्यक्षरद्वयम्।नैतस्मादपरं किञ्चित् तारकं ब्रह्म सर्वथा॥ भगवान शंकर काशी में इसी का उपदेश देते हैं। नारद मोह के अवसर पर भी भगवान विष्णु ने काशी जाकर शिवनाम जप का ही माहात्म्य प्रतिपादित किया है। उसी ‘शिव’ को उपनिषद् चौथी अवस्था ‘तुरीय’ कहती है –शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः। यहाँ तक कि ‘माया’ को भी शिव की सहायिका बताकर उसे भी ब्रह्म तक पहुँचाने का साधन ॠषियों ने स्वीकार किया है –
मं शिवं परमं ब्रह्म प्राप्नोतीति स्वभावतः।
मायेति प्रोच्यते लोके ब्रह्मनिष्ठा सनातनी॥
सनातन धर्म का तो एक ही उदघोष है कि शिव के अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है।
शिवो गुरुः शिवो वेदः शिवो देवः शिवः प्रभुः।
शिवोSस्म्यहं शिवः सर्वं शिवादन्यन्न किञ्चन॥

वेद, गुरु, देवता, इष्ट, मैं और शिव, ये सब शिवमय हैं, शिव से अन्य की कोई सत्ता नहीं है। ‘है’ और ‘नहीं है’ इस रूप से जो कुछ भी कहा जाता है वह सब शिव ही है। सद्गुरुदेव भगवान जो साक्षात् शिवमूर्ति हैं, उनकी परम कृपा से हमारे अन्तःकरण में भी ‘नमः शिवाय’ का रहस्य प्रकट हो जाये। यही शिव से प्रार्थना है।
|| नमः शिवाय ||

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देवों के देव महादेव हैं अद्वितीय...

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