पुस्तके

15-उपदेशसाहस्री (संस्कृत)
ग्रन्थकार :भगवत्पाद श्री शंकराचार्य, संस्कृत विवृत : आनन्दगिरि
सम्पादक : एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री
मूल्य:50॰00
भाष्यग्रन्थों में तो पूज्यपाद आचार्य ने मूलग्रन्थों पर अपनी टिप्पणी की है, जब कि उन्हें अपने अनुभव के आधार पर उसका जैसे विस्तार करना था वह स्वतन्त्र रूप से रचित प्रकरण-ग्रन्थों में स्पष्ट किया है। उपदेशसाहस्री ऐसे प्रकरण-ग्रन्थों में से अतिविशिष्ट व सर्वांगपरिपूर्ण ग्रन्थ है। स्वयं आचार्य ने अपनी इस कृत को उपनिषद् की संज्ञा देकर मानो यह न संकेत किया है कि अध्येता इसे श्रौत ग्रन्थों जितना ही महत्त्व दें। आनन्द गिरि कृत विवृत पहली बार प्रकाशित हुई है। आचार्य के अन्य प्रकरणों में किसी एक प्रक्रिया या विषयका ही विवेचन किया गया है जब कि सम्पूर्ण वेदान्तशास्त्र का दृष्टिकोण व साधनापद्धति का विशद विवेचन होने के कारण उपदेशसाहस्री अपने में अद्वितीय है।

16-सिद्धान्तबिन्दु (संस्कृत)
मूल दशश्लोकी के रचयिता : भगवत्पाद श्री शंकराचार्य,
सिद्धान्तबिन्दुकार : मधुसूदन सरस्वती संस्कृत टीका : गौड ब्रह्मानन्द
सम्पादक :एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री
मूल्य :120॰00
भगवत्पाद श्री शंकराचार्य का ‘दशश्लोकी’ नामक प्रकरण अत्यन्त लघु कलेवर का होने के कारण सांकेतिक होकर रह गया है। इस पर सिद्धान्तबिन्दु की रचना कर मधुसूदन सरस्वती जी ने न केवल मूल ग्रन्थ को स्पष्ट किया है अपितु उसका आधार लेकर चिन्तामणि से प्रारमभ हुई न्याय की शैली को अपनाते हुए नववेदान्त की नींव डाली है।
सकल शास्त्रों के मर्मज्ञ गौडब्रह्मानन्द कृत न्यायरत्नवली टीका तो मधुसूदनकृत ग्रन्थ की महत्ता को बढ़ाने वाली ही है।

17-शतश्लोकी (संस्कृत)
ग्रन्थकार : भगवत्पाद श्री शंकराचार्य, संस्कृत टीकाकार : आनन्दगिरि
सम्पादक :एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री;मणि द्राविड
मूल्य :60॰00
आधुनिक मान्यता वेद का कालविशेष से समबंध मानकर मंत्रभाग को ब्राह्मणभाग से प्राचीन स्वीकारती है और ब्राह्मण-आरण्यक में विशेषतः विस्त्ड़ड़ीत होने से अद्वैत की प्राचीनता पर संदेह करती है। यद्यपि मंत्र-ब्राह्मणात्मक एक ही अनादि वेद है तथापि इस मान्यता की संभवतः पूर्वाशंका मन में रखकर भगवान् भाष्यकार ने विशेषतः मंत्रों के आधार पर औपनिषद दर्शन का मधुर-रुचिर स्त्रग्धराओं में अत्यन्त साहित्यिक एवं गंभीर विवेचन शतश्लोकी में किया है। दैनिक जीवन में उपयोगी अनेक शिक्षाओं से भरपूर यह प्रकरण विस्तृत संस्कृत टीका सहित प्रकाशित है। टिकाकार का नाम श्री आनन्द गिरि है। प्रथम संस्करण निकलने के बाद उपलब्ध एक पुरातन प्रति के अनुसार इस द्वितीय संस्करण में टीका का समग्र पाठ सुधारा गया है व सभी छूटे अंश यथास्थान जोड़ दिये हैं। टिप्पणी, विषयसूची, आकार सूची आदि से ग्रंथ की उपयोगिता बढ़ी हुई है।

18-प्ञ्चीकरणम् (संस्कृत)
ग्रंथकार : भगवत्पाद श्री शंकराचार्य, संस्कृत टीकाएँ`: सुरेश्वराचार्यकृत वार्तिक,
नारायणेन्द्रकृत वार्तिकाभरण; आनन्दगिरिकृत विवरण, रामतीर्थकृत तत्त्वचन्द्रिका
सम्पादक :एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री
मूल्य: 50॰00
संयासाश्रम में साधना हेतु अपनाने योग्य ध्यानपद्धति के मार्गदर्शक इस ग्रंथ के अध्ययन को सुरेश्वराचार्य ने तो प्रत्येक संन्यासी के लिये अनिवार्य ही बताया है। ‘एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्’ कहकर भगवती श्रुति जिसकी प्रतीक के रूप में श्रेष्ठता का प्रतिपादन करती है उस प्रणव की ध्यानोपासना की विधि इस ग्रंथ में विशद रूप से वर्णित है। सुरेश्वराचार्य व आनन्द गिरि दोनों ने इस पर टीका करना आवश्यक समझा, यह बात ग्रन्थ की उपादेयता में ही प्रमाण है।

20-प्रकरणद्वादशी (संस्कृत)
भगवत्पाद श्री शंकराचार्य के बारह प्रकरण-ग्रन्थों का संकलन
संस्कृत टीकाकार: पद्मपादाचार्य, विद्यारण्य, आनन्दगिरि, गौडब्रह्मानन्द, सदाशिवेन्द्र आदि
सम्पादक :एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री
मूल्य: 250॰00
उपदेशसाहस्त्री, सिद्धान्तबिन्दु, शतश्लोकी, पञ्चीकरण, अपरोक्षानुभूति, त्रिपुरी, मनीषापञ्चक, आत्माज्ञानोपदेशविधि, उपदेशपञ्चक, स्वरूपनिरूपण और वाक्यवृति इन बारह प्रकरणों का यह सटीक संकलन वेदान्त के जिज्ञासुओं के लिये विषयवस्तु के स्पष्टीकरण की आवश्यक सामग्री प्रस्तुत करता है। पद्मपाद, विद्यारण्य, आनन्दगिरि आदि विद्वानों की टीकाएँ प्रकरणों को मात्र स्पष्ट ही नहीं करतीं, उनकी उपादेयता के नये आयाम भी जोड़ती हैं। भगवत्पाद आचार्य ने परम्परा से प्राप्त ग्रन्थों पर व्याख्या करते हुए जिन सिद्धान्तों का अविष्कार किया उन्हें ही क्रमबद्ध रूप में इस प्रकार के स्वतंत्र ग्रंथों में स्पष्ट किया है।

21-उपनिषद्भाष्यम्-प्रथम
ईशादि अष्टोपनिषदों का भगवत्पाद शंकराचार्यकृत भाष्य
संस्कृत टीकाकार: सुरेश्वराचार्य, आनन्दगिरि, गोपालयतीन्द्र, अच्युतकृष्णानन्द आदि
सम्पादक :एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री
मूल्य: 500॰00
वैदिक वाङ्मय का ज्ञानकाण्डात्मक अंश उपनिषदों के रूप में प्रसिद्ध है। अद्वैतनिष्ठा को वेदों के तात्पर्य के रूप में ग्रहण करते हुए भगवत्पाद आचार्य ने दष उपनिषदों पर विस्तृत भाष्य लिखकर वैचारिक ऊहापोह की जो प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी, उससे अवैदिक मतों का युक्त्तिबद्ध खण्डन कर दिया। ईशादि अष्टोपनिषदों का भाष्य एवं उपलब्ध सभी टीकाओं का संकलन इस खण्ड में प्रस्तुत किया गया है। तैत्तिरीयवार्तिक भी आनंदगिरि टीका समेत इस संकलन में शोभित है। माण्डूक्यकारिका-भाष्य पर अनुभूतिस्वरूपाचर्यकृत टीका सर्वप्रथम प्रकाशित हुई है।
द्वीतीय संस्करण में इस टीका का अन्य मातृकाओं के अनुसार पाठ-शोधन पण्डित मणि द्राविड ने किया है।

22-बृहदारण्यकोपनिषत्सम्बन्धभाष्यवार्तिकम्-प्रथम (संस्कृत)
बृहदारण्यकोपनिषद् के सम्बन्धभाष्य का सुरेश्वरकृत वार्तिक; संस्कृत ‘शास्त्रप्रकाशिका’ व्याख्या:आनन्दगिरि
सम्पादक :एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री
पुनर्मुद्रणाधीन
भगवत्पाद शंकराचार्य द्वारा बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्य के प्रारम्भ में भूमिका के रूप में लिया गया अंश सम्बन्ध भाष्य कहलाता है। मीमांसकों के मत का स्पष्ट खण्डन करने के लिए आचार्य ने इस अंश का उपयोग किया। सुरेश्वराचार्यकृत वार्तिक न केवल भाष्य के अर्थ को स्पष्ट करता है अपितु आवश्यकता के अनुसार विषय के प्रतिपादन का विस्तार करता है, भाष्य के गम्भीर व गूढ अंशों की युक्तियों के द्वारा नैइ संगति भी लगता है। पूर्वमीमांस व उत्तरमीमांस
-दोनों विचार-धाराओं के प्रकाण्ड विद्वान सुरेश्वराचार्य के अतिरिक्त भला और कौन ऐसा वार्तिक लिखने में समक्ष होता? वार्तिक में प्राभाकरमीमांस का मार्मिक खण्डन है जिसके लिये पूर्वपक्ष समझना अनिवार्य है। आनन्द गिरि स्वामी ने टीका में प्रभाकर के सिद्धान्तों का इतना विशद व स्पष्ट वर्णन किया है कि बृहती आदि से भी ज्यादा हृदयग्राही निरूपण बन गया है।

23- बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्यवार्तिकम्-प्रथम (संस्कृत)
वार्तिककार: श्री सुरेश्वराचार्य; संस्कृत टीका: आनन्द गिरि
सम्पादक :एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री
मूल्य:200॰00
‘वार्तिकान्ता ब्रह्मविद्या’ कह कर जिस ग्रन्थ की महत्ता आनन्द गिरि जैसे विद्वान् ने वर्णित की है उस ग्रंथ के दो अध्याय इस खण्ड में टीकासहित दिये गये हैं। भगवत्पाद आचार्य द्वारा भाष्य में मीमांसकों का जो मुखमर्दन किया गया है, उसका सटीक विवेचन सुरेश्वर से बेहतर और कौन करता? स्वयं आचार्य की आज्ञा के अनुसार वार्तिक लिखकर सुरेश्वराचार्य ने भी इसएक ग्रन्थ के ही माध्यम से अपनी विद्वत्ता की छाप छोड़ दी। वार्तिक पर आनन्दगिरि की टीका भी साथ में ही दी गयी है जिसे प्रभाकर-मत समझने के लिये भी उतना ही आवश्यक समझा जाता है जितना वेदन्तसिद्धान्त और विशेषकर वार्तिकार्थ बुद्धिगत करने के लिये।

24-उपनिषद्भाष्यम्-2 (छान्दोग्य) (संस्कृत)
भगवत्पाद शंकराचार्यकृत छान्दोग्यभाष्य
संस्कृत टीका: आनन्द गिरि, नरेन्द्रपुरी एवं अभिनवनारायणेन्द्र
सम्पादक :एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री(द्वितीय संस्करण:श्री मणि द्राविड)
मूल्य:350॰00
भगवत्पाद शंकराचार्य द्वारा छान्दोग्य-उपनिषद् पर किये गये भाष्य के साथ तीन प्रमुख टीकाएँ
इस खण्ड में संकलित है। सम्पादक ने विस्तृत टिप्पणियों में मतान्तरीय व्याख्याओं की विद्वत्तापूर्ण आलोचना उपस्थित की है जिसमें तुलनात्मक अध्ययन के लिए यह संस्करण अनिवार्य हो गया है। द्वितीय संस्करण में उपनिषच्छब्दकोश एवं उद्धरणसूची जोड़कर ग्रन्थ को सर्वांगपूर्ण बनाया गया है।

27-बृहदारण्यकोपनिषद्-विद्यारण्यदीपिका(संस्कृत)
संस्कृत ‘दीपिका’ टीका:श्री विद्यारण्य
सम्पादक :एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री
मूल्य :60॰00
थोड़े से अन्तर के साथ बृहदारण्यकोपनिषद् की दो आवृत्तियाँ क्रमशः यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा और काण्व शाखा में मिलती हैं। भगवत्पाद श्री शंकराचार्य द्वारा काण्वशाखीय उपनिषद् पर भाष्य किये जाने से परवर्ती विद्वानोंने भी उस पर व्याख्यायें की। माध्यन्दिनशाखीय उपनिषद् पर विस्तृत टीक के अभाव की पूर्ति श्री विद्यारण्य स्वामी की दीपिका द्वारा हुई है।

28- उपनिषद्भाष्यम-3 (बृहदारण्यक) (संस्कृत)
भाष्यकार :भगवत्पादक श्री शंकराचार्य; संस्कृत टीका : आनन्द गिरि एवं विद्यारण्य
सम्पादक :एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री
मूल्य :220॰00
शुक्ल यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण के अन्त में आने वाली यह उपनिषद् सबसे बड़ी उपनिषद् है। आचार्य का भाष्य काण्वशाखीय पाठ के आधार पर है तो विद्यारण्यकृत दीपिका माध्यंन्दिनशाखीय पाठानुसारिणी है। आनन्दगिरि ने भाष्य पर टीका लिखते समय सुरेश्वरकृत वार्तिक के दृष्टिकोण को महत्त्व दिया है।
विस्तृत कण्डिका-सुची और शब्दवाक्यकोष का परिशिष्टमें अन्तर्भाव किया गया है। आचार्य महामण्डलेश्वर श्री स्वामी महेशानन्द गिरि जी द्वारा विस्तृत अंग्रेजी भूमिका विषयवस्तु को स्पष्ट करने में सहायक होगी।

30-बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्यवार्तिकम्-2 (संस्कृत)
वार्तिककार : श्री सुरेश्वराचार्य, संस्कृत टीका : आनन्दगिरि
सम्पादक :एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री
मूल्य :300॰00
प्रथम खण्ड में वार्तिक के प्रथम दो अध्याय प्रकाशित किये जा चुके हैं। अब इस खण्ड में तीसरे से छठे अध्याय तक टीका सहित वार्तिक प्रकाशित किया गया है। परिशिष्ट में उद्धरणों की विस्तृत आकार-सूची दी गयी है साथ ही जोड़ी गयी वार्तिक कि 186 पृष्ठों की श्लोकार्धसूची इस प्रकाशन की विशेषता मानी जा सकती है। आशा है कि यह विस्तृत सूची अध्येताओं के लिये महत्त्वपूर्ण एवं उपकारक सिद्ध होगी।

31-उपदेशसाहस्री (संस्कृत एवं हिन्दी टीका)
ग्रन्थकारक : भगवत्पाद श्री शंकराचार्य; हिन्दी टीकाकार :गजाननशास्त्री जी मुसलगाँवकर
पुनर्मुद्रणाधीन
भगवत्पाद श्री शंकराचार्य का यह महत्त्वपूर्ण प्रकरण-ग्रन्थ श्री आनन्दगिरि कृत संस्कृत टीका सहित पहले ही प्रकाशित हो चुका है। भौतिकतावादी युग में लोग शांस्त्रों से तो दोर होते ही जा रहे हैं, यँहा तक की संस्कृत भाषा से परिचित नहीं रहे हैं। तथापि अपने उद्धार की इच्छा इन्हें भी रहती है और उनको भी शास्त्रसम्मत विद्या से वंचित नहीं रखना है। इस दृष्टि से श्रीगजाननशास्त्री मुसलगाँवकर द्वारा श्री आनन्दगिरि एवं रामतीर्थ की टीकाओं के आधार पर की गयी उपदेशसाहस्री की हिन्दी व्याख्या निश्चित ही उपादेय होगी। उपदेशसाहस्री, सिद्धान्तबिन्दु एवं पञ्चीकरण ये तीन ग्रन्थ, श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन के ग्रन्थ हैं। उपदेशसाहस्री के पठन से ज्ञानोपयोगी सारी साधना का ज्ञान अवश्य हो जाता है।
श्लोकसूची ने इस प्रकाशन की उपादेयता में वृद्धि की है।

32-वेदान्तसन्दर्भ (संस्कृत)

भगवत्पाद श्री शंकराचार्य ने प्रस्थानत्रयी के भाष्य के अतिरिक्त ऐसे बहुत से ग्रन्थों का प्रणयन किया जिन्हें औपनिषद अवान्तर वाक्यों की कोटि में रखा जा सकता है। अनेक परवर्ती महापुरुषों ने भी आत्मा का स्वरूप, जगत् की भ्रमरूपता आदि का स्वतंत्र विवेचन किया है। वेदान्तप्रतिपादक विभिन्न प्रक्रियाओं की कुञ्जी भी इन स्फुट प्रकरण ग्रन्थों में मिल जाती है। परवर्ती महापुरूषों के बहुत से ग्रन्थ क्षेत्रविशेष में प्रचलित हैं तो अनेक लुप्तप्राय हैं।
प्रस्तुत संकलन में भगवत्पूज्यपाद श्री शंकराचार्य के अधिकांश प्रकरण-ग्रन्थों के साथ अन्त ज्ञात-अज्ञात महापुरुषों के ग्रन्थ एकत्रित किये गये हैं। संकलित 67 प्रकरणों में अवाध्याय की दृष्टि से उपयुक्त कुछ श्रौत एवं पौराणिक ग्रंथ देकर पुस्तक की उपादेयता को बढ़ाने का प्रयास किया गया है।

33-पञ्चपादिका (संस्कृत)
पद्मापादाचार्यकृत ‘पञ्चपादिका’, प्रकाशात्माचार्यकृत ‘विवरण’,
अखण्डानन्दमुनिकृत ‘तत्त्वदीपन’ तथा विष्णुभट्टोपाध्यायकृत ‘ॠजुविवरण’
सम्पादक : एस॰ सुब्रह्मण्य शास्त्री पुनर्मुद्रणाधीन
इस ग्रन्थरत्न में भगवान् शंकराचार्यकृत शारीरकमीमांसाभाष्य के प्रथम चार सूत्रों की ‘पञ्चपादिका’ नामक अतिविशद व्याख्या प्रस्तुत है भगवान् भाष्यकार के साक्षात् शिष्य होने के कारण ग्रन्थकार आचार्य पद्मापाद भाष्य का आशय समझने वाले सबसे प्रामाणिक सक्षम अनुभवी महात्मा रहे हैं। पञ्चपादिका की प्रकाशात्मश्रीचरणकृत ‘विवरण’ नामक टीका भी यँहा संयोजित है, जिसमें साधन-साध्यविषयक ऐसे अनेक रहस्य विस्पष्ट किये गये हैं जो वेदान्तसाहित्य में दिर्लभ हैं। पूर्ण ब्रह्मसूत्र का व्याख्या न होने पर भी पञ्चपादिका और विवरण में समस्त शाङ्करसिद्धान्त विशेष रूप से उपस्थित किया गया है। विवरण की अखण्डानन्दमुनिकृत ‘तत्त्वदीपन’ और विष्णुभट्टोपाध्यायकृत ‘ॠजुविवरण’ इन दो टीकाओं से ग्रन्थ का आशय तो बुद्धिगत होता ही है, बहुतेरे ऐसे तत्त्व भी प्रकाश में आते हैं जिनसे ग्रन्थान्तरों को समझना सम्भव हो जाता है। विस्तृत विषयसूची और उद्धरणसूची से अन्वेषकों का उपकार किया गया है। आंग्ल भूमिका में पञ्चपादिका प्रस्थान का परिचय और भामती प्रस्थान से वैशिष्टय समझाया गया है। अत: तत्त्वजिज्ञासुओं तथा अनुसन्धाताओं के लिए यह पुस्तक एक अनिवार्य संग्रह है।

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देवों के देव महादेव हैं अद्वितीय...

भारत के गरिमायुक्त ग्रंथ शिवपुराण में शिव और शक्ति में समानता बताई गई है और कहा गया है कि दोनों को एक-दूसरे की जरूरत रहती है। न तो शिव के बिना शक्ति का अस्तित्व है और न शक्ति के बिना शिव का। शिव पुराण में यह भी दर्ज है कि जो शक्ति संपन्न हैं, उनके स्वरूप में कोई अंतर नहीं मानना चाहिए। भगवती पराशक्ति उमा ने इंद्र-आदि समस्त देवताओं से स्वयं कहा है कि ‘मैं ही परब्रह्म, परम-ज्योति, प्रणव-रूपिणी तथा युगल रूप धारिणी हूं।

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